तरकीब
गाजियवाद हरिद्वार हाईवे पर स्थित वैशाली का शुमार गाजियवाद के पॉश इलाकों में किया जाता है। यहीं पर मेन हाईवे पर बना हुआ है तोशिबा टॉवर। तोशिबा टॉवरएक बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स है और इसी कॉम्प्लेक्स की पाँचवी मंज़िल पर ऑफिस है एडवोकेट राज शर्मा का। राज करीब उन्नतीस वर्ष का औसत कदकाठी का गोरा चिट्टा, अच्छे नैन नक्श का हँसमुख नौजवान था। परिवार के नाम पर बस वह तन्हा ही था। अपने माता–पिता की वह एकलौती संतान था। उसके माता–पिता काएक गाड़ी एक्सीडेंट में करीब दस वर्ष पहले ही निधन हो चुका था। माता–पिता के निधन के पश्चात राज ने किसी रिश्तेदार के पास रहना स्वीकार नहीं किया था। अपनी पढ़ाई-लिखाई से लेकर दूसरा सभी फैसले उसने स्वयं ही किये। उसके पिता पंकज शर्मा गाजियवाद में फौजदारी के टॉप के वकील थे। रुपया रुपया वह बहुत छोड़कर गए थे। अतःइसे तरफ से राज को कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। तोशिबा टावर का ऑफिस भी उसके पिता का ही था। इसके अतिरिक्त डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में भी उसके पिता का चेम्बर था। उसके पिता की पल्लवपुरम फेस टू में आलीशान कोठी थी जिसमें अपने माता–पिता के निधन के पश्चात से वह तन्हा ही रहता था। संग में सिर्फ उसके पिता का वफादार नौकर जय ही रहता था। जय बचपन से ही उनके इधर काम करता था और राज का जन्म भी उसके सामने ही हुआ था। कोई भाई-बहन ना होने की वजह से राज का बचपन जय के संग ही ज्यादा गुज़रा था। इसीलिए राज उसे ज्यादा मान भी देता था।
पूरी कोठी जय के ही हवाले थी। सुबह शाम कामवाली आती थी जो बर्तन और स्वच्छ सफाई कर जाती थी, पर खाना स्वयं जय ही बनाता था। ज्यादा ही मुँहलगा पर वफ़ादार नौकर था जय; बल्कि नौकर नहींएक तरह से राज का अभिभावक ही था। राज को छह वर्ष हो चुके थे वकालत की डिग्री लिए। वकालत की पढ़ाई करते टाइमही वह अपने पिता केएक सीनियर वकील दोस्त के चेम्बर में तीन वर्ष बैठ कर काम सीख चुका था। अब ऑफिस, चेम्बर और लाइब्रेरी तो विरासत में पिता से मिल गए थे, पर केस तो स्वयं ही पकड़ने पड़ेंगे।
छह वर्ष में कुल तीस केस आये थे, जिनमें नोटरी, शपथपत्र, किरायेदारी एग्रीमेंट औरएक दो साधारण मार-पीट के ज़मानती अपराधों की जमानत के केस भर थे, पर उसकी भी जिद थी कि करनी तो वकालत ही है।
आज भी वह सुबह आठ बजे ऑफिस जाने के लिए तैयार था। आठ से दस ऑफिस, दोबारा कोर्ट वाले चेम्बर में। वहाँ से चार पाँच बजे दोबारा ऑफिस। दोबारा रात को नौ दस बजे तक घर। सेट दिनचर्या थी उसकी जिसमें कोई बदलाव मुश्किल ही होता था। हाँ, शनिवार को गाजियवाद में हाइकोर्ट बेंच की माँग को लेकर दशकों से जारी हड़ताल और रविवार को छुट्टी होने के कारण वह पूरे दिन ऑफिस में ही पाया जाता था।
“काका दे दो कुछ खाने को, देर हो रही है।”–वह डाइनिंग टेबल से चिल्लाया। जय रसोई से आया और चाय, टोस्ट और ऑमलेट रख गया। राज ने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया और अपनी बलेनो गाड़ी में बैठ ऑफिस के लिए उड़ चला। ऑफिस में बाहरएक रिसेप्शन और वेटिंग लाउंज था और अंदर उसका ऑफिस था।
ऑफिस में तीन दीवारों पर रैक में करीने से कानून की किताबें लगी हुई थीं।एक लकड़ी की शीशे के टॉप वाली विशाल टेबल औरएक चमड़ा मढ़ी शानदार रिवॉल्विंग चेयर थी जिस पर वह जाकर पसर गया।बाहर् रिसेप्शन पर कोई नहीं था। उसके लिए कोई बंदा रखा ही नहीं हुआ था तो होता भी कहाँ से ! पर वह जल्दी ही किसी को रखने के जुगाड़ में था कि कोई मिल जाये कम पैसों में, तो रख लूँ। पर आजकल कम पैसों में क्या होता है ? आदमीएक गर्लफ्रेंड तो एफोर्ड कर नहीं सकता, रिसेप्शनिस्ट रखना तो दूर की बात थी। कोई जूनियर वकील ही मिल जाता। दोबारा उसे अपनेइसे खयाल पर स्वयं ही हँसी आ गई।
जूनियर वकील और उसके पास ! सीनियर ही खाली बैठा है, जूनियर ही क्या करेगा टी०वी० देखने के सिवा ! तभी उसकी मेज पर रखी कार्डलेस बैल बजी।बाहर् कोई था। पता नहीं कौन होगा ? अब उसे स्वयं हीदेख्ना पड़ेगा। कोई क्लाइंट हुआ तो क्या इम्प्रेशन पड़ेगा! बहरहाल वह उठा और दरवाजा खोल करबाहर् झाँका।बाहर् मुँह पर मास्क लगाएएक लड़की खड़ी थी जिसने सफेद सलवार सूट पर काला कोट पहन रखा था। गले मे बैंड भी बाँधा हुआ था। कोई चौबीस पच्चीस वर्ष की लंबे ऊँचे कद की लड़की थी। उसकी आँखो में जहीन होने के जज्बातों तो थे, लेकिन संग ही संग परेशानी भी झलक रही थी। “फरमाइए!”–राज ने शालीनता से अपना मास्क व्यवस्थित करते हुए कहा। “एडवोकेट राज शर्मा ?” –लड़की ने प्रश्नवाचक ढंग से पूछा।
“जी हाँ, कहिये। मैं ही हूँ।”
“नमस्ते सर.सर, क्या आपसे दो मिनट बात कर सकती हूँ ?”
“आइए।”–राज ने पूरा दरवाजा खोलते हुए कहा। लड़की उसके बराबर से होकर परफ्यूम की खुशबू छोड़ती अंदर केबिन में आ गई। राज ने उसे कुर्सी ऑफर की। वह सावधानी पूर्वकएक कुर्सी पर बैठ गई। राज पूरा घेरा काट कर अपनी कुर्सी पर आ बैठा। “फरमाइए क्या सेवा कर सकता हूँ मैं आपकी ?”
“एक गिलास पानी पिलवा दीजिए।”–लड़की व्याकुल निगाहों से चारों तरफ देखती हुई बोली।
उसकी माँग सुनकर एकबारगी राज अचकचाया दोबारा अपनी कुर्सी से उठा औरबाहर् फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर फ्रिज के उपरि रखे गिलास में डाल कर ले जाकर लड़की को पेश कर दिया।
लड़की ने कृतज्ञ जज्बातों से गिलास थामा और मास्क को हटा करएक साँस में गटक गई। अच्छी खासी खूबसूरत लड़की थी ।
“और ?”–राज ने गौर से उसे देखते हुए पूछा।
“जी नहीं, शुक्रिया।”–उसने पुनः मास्क लगा लिया।
राज दोबारा घूम कर अपनी चेयर पर आ बैठा और लड़की की तरफ प्रश्नसूचक निगाहों से देखने लगा। “कुछ कहना चाहती हैं ?”–लड़की को बोलता ना पाकर उसने पूछा।
“सर आप केस लाने वाले को क्या कमीशन देते हैं ?”–वह बड़े संकोचपूर्ण स्वर में बोली।
“पच्चीस परसेंट।”–राज सावधान स्वर में बोला।
“वह.वह तो सभी देते हैं।”
“मैं भी सभी में ही हूँ। मैं क्या चाँद से आया हूँ।”–राज हँसकर बोला।
“मुझे पैसों की ज्यादा जरूरत है।”–वह जैसे स्वयं से ही बोली।
“किसे नहीं होती ?”–राज तपाक से बोला।
“देखिए मैं ज्यादा मुश्किल से सर्वाइव कर पा रही हूँ। मैं गाँव से बिलोंग करती हूँ। इधर किराये पर रहती हूँ। घर से बिलकुल पैसे नहीं मिलते। वे लोग तो चाहते हैं कि मैं गाँव वापिस आ जाऊँ, पर मुझे हर कीमत पर संपन्न होना है।”
“हर क़ीमत पर!”–राज की भवें सिकुड़ी।
“मेरा मतलब चाहे कितनी भी मेहनत, कितना भी संघर्ष करना पड़े।”–वह जल्दी से बोली।
“मुझसे क्या चाहती हैं ?”
“कमरे का किराया भी देना होता है। दोबारा खाना और भी ज्यादा कुछ खर्च होता है।”–वह दोबारा जैसे स्वयं से ही बात करने लगी। ऐसा लग रहा था कि जो प्रस्ताव वह देने जा रही थी उससे वह पहले स्वयं को ही संतुष्ट करना चाह रही थी।
“आप मुझसे क्या चाहती हैं ?”–राज ने अपना प्रश्न दोबारा दोहराया।
“चा.चालीस।”–वह अटकते-अटकते बोली।
“डन।”
“जी!”–जैसे उसे अपने कानों पर यकीन नहीं आया।
“मैंने कहा डन।”
“थैंक यू सर।”–वह साफ-साफ राहत की साँस लेते हुए बोली।
राज मुस्कुराया।
“वैसे आप हैंडल कर तो लेंगे ना केस ?”–वह सशंक स्वर में बोली।
“आप की बात जल्दी मान लीइसलिये पूछ रही हो ?”–वह हँसा।
“सॉरी सर।”
“वैसे आपके लिए मेरे पासएक और प्रस्ताव भी है।”
“वो क्या सर ?”
“आप मेरे साथएक एसोसिएट फर्म बना लीजिए। ये ऑफिस है, कोर्ट में चेम्बर है, सभी लुक आफ्टर कीजिये। केस लाइये जो भी अर्निंग होगी फिफ्टी फिफ्टी।”
“सर आप मजाक कर रहे हैं ? दोबारा तो आपने फोर्टी परसेंट वाली बात भी मजाक में ही कही थी ना ?”–उसकी आँखों मे शंका के बादल दोबारा छा गए।
“नहीं। कोई मजाक नहीं है। आय’म सीरियस।”
“लेकिन मेरे पास लगाने के लिए पैसे नहीं हैं बिल्कुल भी।”–वह संकोचपूर्ण स्वर में नजरें झुका कर बोली।
“केस तो लाओगी ? मेहनत तो करोगी ?”
“बिल्कुल सर। उसमें आपको कभी कोई शिकायत नहीं होगी।”
“ये ऑफिस है।बाहर् अपनी नेम प्लेट लगवा लो।बाहर् कंप्यूटर भी लगा हुआ है। वाई फाई का कनेक्शन है ही। बैठो और यहीं से ऑपरेट करो।”
तुरंत उसका चेहरा हज़ार वाट के बल्ब की तरह रोशन हो गया। “मैंबाहर् देख लूँ सर ?”–वह अपनी कुर्सी से उठती हुई बोली।
“श्योर।” वहबाहर् जा कर टेबल, कुर्सी, कंप्यूटर सभी देखने लगी। उसकी खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी। “पर सरइसे सबसे आपको क्या फायदा ?”–उसे शंकाएं
दोबारा सताने लगीं।
“क्योंकि मेरे पास काम नहीं है, और तुम्हारे पास ऑफिस नहीं है। हम दोनों यदि मिलकर काम करते हैं तो दोनों का फायदा है।”–राज ने स्पष्ट बता दिया।
“काम तो मैं ले ही आऊँगी सर।”–वह आत्मविश्वास भरे स्वर में बोली।
“तो दोबारा पार्टनरशिप पक्की।”–राज उसकी तरफ हाथ बढ़ाता हुआ बोला।
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“पक्की सर।”–उसने भी गर्मजोशी से राज से हाथ मिलाया। “अब वह काम करते हैं, जो हमे सबसे पहले करना चाहिए था।”
उसने उलझनपूर्ण दृष्टि से राज की तरफ देखा। “मैं एडवोकेट राज शर्मा!”–राज ने दोबारा उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
“ओह, मैं एडवोकेट डॉली मलिक।”–वह राज का अपनी ओर बढ़ा हुआ हाथ थामकर मास्क के अंदर मुस्कुराती हुई बोली।
“डॉली ये ऑफिस की चाभी।”–राज ने ड्रॉअर से चाबी काएक गुच्छा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा–”मेरे पास एक्स्ट्रा सेट है।”
उसने सहमति से सर हिलाते हुए चाबियों का गुच्छा पकड़ लिया।
“अब पिलवाते हैं आपको चाय।”–राज ने मोबाइल निकाला औरएक नम्बर पर व्हाट्सएप्प कर दिया। “ये नीचे कैंटीन का नम्बर है। जब भी कुछ मँगवाना होगा तो बस मैसेज कर देना।” उसने सहमति से सर हिलाया।
“नीचे सेकंड फ्लोर परएक नेम प्लेट बनाने वाला है। अभी बोल देंगे तो शाम तक ही तैयार कर देगा।”
“वह मैंएक दो दिन में बनवा लूँगी।”–वह जल्दी से बोली।
“अरे तो कहीं जाना थोड़े ही है। अभी फोन कर दूँगा तो यहीं आ जायेगा।”
“जाने दीजिये सर। मैं बनवा लूँगीएक दो दिन में।”
“ओह! पैसे नहीं हैं अभी ?”–राज धीमे से बोला।
लड़की का झुका सर और झुक गया। “यहाँ गाजियवाद में कहाँ रहती हो ?”
“ वैशाली में कमरा ले रखा है सर।”
“ वैशाली में तो है, पर वैशाली में कहाँ ?”
वह खामोश सर झुकाए बैठी रही। “अरे कमरा है भी या नहीं ?”
“कमरा है।”
“पर कहाँ है ये नहीं बताओगी।”–वह हँसा।
“डबल स्टोरी में है सर।”
“क्या डबल स्टोरी में ?”–राज चौंका। डबल स्टोरी सरकारी आवासीय योजना के अंतर्गत मिले एक-एक कमरे के फ्लैट थे। सड़क टूटी हुई थी और ज्यादातर निम्न वर्ग के लोग वहाँ रहते थे। जरायमपेशा लोगों का वह अड्डा था और तो और सेक्स ट्रेड में लिप्त लड़कियों के भी वहाँ अड्डे थे।
“तुम्हें पता तो है ना कि वह कैसी स्थान है ?” “उसने हल्के से सहमति में सर हिलाया। निरंतर फर्श की ओर देखे जा रही आँख सेएक आँसू गिरा और उसकी गोद मे गिर कर जज़्ब हो गया। तभी चायवाला लड़का आया और चाय दे गया।
“लो चाय पियो।”–राज ने गिलास उसकी तरफ बढ़ाया।
लड़की ने गिलास थाम लिया।
“तुम्हारा क्या क्या सामान है कमरे पर ?”
“बसएक बैग है। पलंग है और दो चार बर्तन होंगे। क्यों ?”–लड़की चाय में घूँट मारती हुई बोली।
“चाय पियो, मैं अभी तुम्हारे संग चल रहा हूँ। वहाँ से सामान उठाओ। मैं अभी तुम्हारे रहने की व्यवस्था कहीं और कराता हूँ।”
“कहाँ ?”
“कहीं भी हो वहाँ से तो हर हाल में अच्छी ही होगी।”
“वहाँ बारह सौ रुपये में है कमरा।”–वह धीरे-धीरे से बोली।
“मैं हजार में दिला दूँगा उससे कहीं बेहतर।”
“अभी उसका किराया भी बाकी है।”–वह इतने संकोच से बोली कि राज मुश्किल से सुन पाया।
“कोई बात नहीं। एडवांस ले लो ऑफिस से।”–उसने जेब से पाँच-पाँच सौ के दस नोट निकाले और उसके सामने रख दिये औरएक रजिस्टर निकाल कर उस पर लिख दिया–डॉली शर्मा एडवांस 5000।
“लेकिन मुझे इतने पैसे नहीं चाहिए।”
“तो खर्च मत करना। केस लाओगी तो तुम्हारे हिस्से में से कट जायेंगे। केस तो लाओगी ना ?”
“वह तो लाऊँगी ही हर हाल में।”–उसने धीरे-धीरे से पैसे उठा कर कोट की जेब मे रख लिए।
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राज उठा और उसे संग लेकर चल दिया। कॉलोनी पहुँचकर उसके कमरे से पहले उसका सामान उठवाया दोबारा गाड़ी सीधी अपनी कोठी पर ला कर खड़ी कर दी।
डॉली गाड़ी से उतर कर सशंक निगाहों से कोठी को देख रही थी।
“आओ।”–राज आगे बढ़कर कोठी का गेट खोलता हुआ बोला। “यहाँ हजार में कैसे मिल जायेगा कमरा!”
“काका जरा उपरि की चाबी देना।”–राज ने आवाज लगाई। तीन सौ गज में बनी हुई थी राज की कोठी। नीचे ही चार बैडरूम थे। उपरि की मंजिल परएक बैडरूम,एक बड़ी सी लॉबी और किचन थी। उपरि का हिस्सा ज्यादातर बंद ही रहता था। बस साफ-सफाई हर दूसरे तीसरे दिन होती थी।
काका ने चाबी लाकर दी और प्रश्नसूचक निगाहों से डॉली को देखा।
“अभी आकर बताता हूँ।”–वह काका से बोलकर डॉली से मुख़ातिब हुआ–”आओ।” कोठी के पीछे बनी सीढ़ियों से होकर वह उपरि पहुँचा। डॉली उसके पीछे-पीछे आ रही थी। चाबी लगा कर उसने दरवाजा खोला और अंदर आ गया।
डॉली अंदर आकर नर्वस जज्बातों से पोर्शन, बेड, टी०वी०, फ्रिज, अलमीरा आदि को देखने लगी।
“ये लो चाबी। वैसे इधर जरूरत का सारा सामान है। पर यदि कुछ चाहिए हो तो पैसे तुम्हारे पास हैं ही, जाकर ले आना.ठीक है ?”
“लेकिन ये है किसका ? ये तो फर्निश्ड है। उपरि से ज्यादा बड़ा भी है। मैं इधर कैसे रह सकती हूँ ? ये तो ज्यादा महँगा होगा।”
“ये मेरा ही घर है। सालों से ये हिस्सा बन्द पड़ा है। बस साफ-सफाई के लिए ही खोला जाता है। कोई नहीं रहता यहाँ, तो तुम ही रह लो। क्या फर्क पड़ता है ? हजार देने की बात हुई है, दे दिया करना।”
“आप ये सभी मेरे लिए क्यों कर रहे हैं ?”–वह आशंकित स्वर में बोली। शायद उसके स्त्री होने के एहसास उसे शंका करने पर मजबूर कर रहे थे।
“ये प्रश्न तुम्हारे दिमाग में ज्यादा आ रहा है। तो यदि ऐसा-वैसा कुछ आ रहा है, तो उसे दिमाग से खुरच कर फेंक दो और केस लाने की तरफ ध्यान लगाओ। मेरा जुनून है कि मैं अपने बाप से बड़ा वकील बनूँ। पैसे के लिए काम करने की मुझे कोई जरूरत नहीं है। सारे तुम ले लिया करना। मैं केस माँगने नहीं जा सकता। पर तुम ये कर सकती हो। मेहनत करो, केस लाओ सभी पैसे तुम्हारे। मुझे बस नाम चाहिए। अब समझ गईं न कि मैं ये सभी क्यों कर रहा हूँ ?”
“सॉरी।”–वह खेदपूर्ण स्वर में बोली।
“एक बात और.तुम्हारे कमरे में खाना बनाने का कोई सामान नहीं था, तो खानाबाहर् से खाती होगी और पैसे तुम्हारे पास थे नहीं, तो ईमानदारी से बताओ कब से खाना नहीं खाया ?”
“कल सुबह खाया था।”–गर्दन दोबारा झुक गई।
“फ्रिज चालू कर लो। खाना मैं नीचे से भिजवा देता हूँ। यदि उचित समझो तो आज नीचे ही खा लो। शाम से अपना खाना बना लेना। उपरि किचन में सभी सामान है। जो कम हो जाकर ले आना।”
“जैसा आप कहो। मैं नीचे ही खा लूँगी और आपकी फैमिली से भी मिल लूँगी।”
“फैमिली से तो तुम मिल ही ली हो। बस मैं और काका ही हैं और कोई नहीं है मेरा।”
“कोई नहीं है! आप अकेले ही हो ?”–वह हैरानी भरे स्वर में बोली।
“काका भी नौकर हैं; हालाँकि मेरे लिए वह सभी कुछ हैं पर हकीकत यही है कि दुनिया में मेरा कोई अपना नहीं है। मामा, फूफा हैं, पर अपना कोई नहीं है।”
“मैं नीचे आकर ही खा लूँगी।”
“ओके।”–कहकर वह जाने को मुड़ गया।
“कितनी देर में आऊँ ?”–वह व्यग्र स्वर में बोली।
“साथ ही चलो। मुझे पता है कि तुम्हें जोरों की भूख लगी होगी। यदि खाने में देर होगी तो मिठाई, बिस्कुट खिलवाऊँगा तब तक।”–वह हँसा।
डॉली सच मे ही संग चल दी। शनिवार का दिन था। दोपहर केएक बजे के आसपास का वक़्त था। राज ऑफिस में बैठा मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त था। डॉली बाहर् रिसेप्शन पर बैठी अपने नाखूनों पर नेल पॉलिश लगा कर फूँक मार-मार कर सुखा रही थी। बीच-बीच में हाथ अपनी आँखों के आगे करके देख लेती थी कि कैसे लग रहे हैं। नारी चाहे वकील बन जाये चाहे जज और चाहे आई०जी०, पर गाहे-बगाहे उसका नारीत्व, पद और रुतबे का पर्दा हटा करबाहर् झाँकता जरूर है। डॉली को व्यावसायिक रूप से राज से जुड़े दो महीने हो गए थे।इसे दरम्यान वह तीन केस लाने में कामयाब हो भी गई थी। तीन में से दो तो जमानत के केस थे औरएक सैशन ट्रायल था। स्कोर बेहद कम था, लेकिन डॉली को पूरी उम्मीद थी कि उनकी लॉ फर्म ‘आर० डी० एसोसिएटस’एक दिन गाजियवाद की कामयाब लॉ फर्म बन कर ही रहेगी।
तीनों केसों से जो पैसे फीस के मिले उनमें से उसके शेयर के पैसों में से एडवांस के पाँच हज़ार राज को लौटा कर भी उसके पास ठीक-ठाक पैसे बचे हुए थे और वैसे भी अब उसका ख़र्चा ज्यादा कुछ था भी नहीं। कुल मिलाकर जिंदगी पटरी पर लौटती नजर आ रही थी। अभी वह अपने नेल पॉलिश अभियान में लगी हुई ही थी, किबाहर् का दरवाजा खुला और चेहरे से ही परेशान दिख रहीएक तीस बत्तीस वर्ष की स्त्री ने प्रवेश किया। स्त्री अच्छे नैन-नक्श की सुंदर कही जा सकने वाली स्त्री थी। स्त्री ने सिंपल कुर्ती और लेगिंग पहन रखी थी तथा चेहरे से संभ्रांत परिवार की लग रही थी।
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