ना भूलने वाली सेक्सी यादें
बंधुओ भाइयो और प्यारे पाठको मैं आरएसएस पर ज्यादा दिनों सेएक साइलेंट यूज़र बन कर आनंद ले रहा हूँ . सभी लेखक बंधु कितनी मेहनत कर रहे हैं कुछ बंधु अपनी कहानी ला रहे हैं कुछ बंधु अच्छी कहानियों को हिन्दी में परवर्तित करके पाठकों का मनोरंजन कर रहे है . कुछ नये बंधु भी अपनी कहानियाँ ला रहे हैं . ये आरएसएस के लिए शुभ संकेत हैं .
सभी बंधुओं को सेएक गुज़ारिश हैं कि मैं भी आपका थोड़ा सा मनोरंजन करने की कोशिस करने जा रहा हूँ . अतः आप सभी से निवेदन है कि आप सभी मेरा संग अवश्य दें . अब मैं आपको बोर ना करते हुए कहानी शुरुआत करने जा रहा हूँ परएक बात और कहना चाहता हूँ कि ये कहानी मम्मी , बहन की चुदाई पर आधारित है इसीलिए जिन बंधुओ को पारवारिक रिश्तों की कहानियाँपस्न्द ना हों वोइसे कहानी को ना पढ़ें
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यह मेरे अठारहवें जनमदिन के कुछ ही दिनो पश्चात की बात है जब मैने ग़लती से अपने पिता केएक छोटे से गुपत स्थान को ढूँढ लिया.इसे छोटी सी स्थान मे मेरे पिता जी अपने राज़ छिपा कर रखते थे. ये गुपत स्थान बेहद व्यक्तिगत चीज़ों का ख़ज़ाना था. इनमे कुछ सस्ती ज्वेलरी थी जिनकी कीमत बाज़ारु कीमत से ज़्यादा शायद जज़्बाती तौर पर थी. कुछ उनके पुराने दोस्तो के फोटोग्रॅफ्स थे, कुछ कभी नज़दीकी लोगो द्वारा लिखी गयी चिट्ठियाँ थी. कुछ अख़बारों के कटाउट थे जो शायद उनके मतलब के थे.एक खास किसम का मार्का लिए दो रुमाल थे,इसे मार्क को मैं जानता नही था. कुछ सिनिमास के, प्लेस के, और क्रिकेट मॅचस के टिकेट थे जो उन्होने इस्तेमाल नही किए थे.
उसके पश्चात कुछ ख़ास चीज़ें सामने आई. तीन प्रेम पत्र जो उनकी माशूकों ने उनको लिखे थे. दो खत किसीएक स्त्री के लिखे हुए थे जिसने नीचे, खत के अंत में अपने नाम के सुरुआती अक्षर स से साइन किए हुए थे जो मेरी मम्मी के तो यकीनी तौर पर नही थे. तीसरा खत किसी ऐसी स्त्री का था जिसका दिल मेरे पिता ने किसी मामूली सी बात को लेकर तोड़ दिया था और वो मेरे पिता से पुनः आने की भीख माँग रही थी. इसके अलावा मुझे तीन तस्वीरे या यूँ कहे कि तीन महिलाओं की तस्वीरें मिली. सभीएक सेएक सुंदर और जवान, और यही मेरे पिता का असली राज़ था जिसे उन्होने दुनिया से छिपाया हुआ था. उनमे सेएक तस्वीर को देख कर मैने फ़ौरन पहचान लिया, वो मेरी आंटी थी, मेरे पिताजी के बड़े भाई की पत्नी यानी उनकी बड़ी भाबी. लेकिन तस्वीर देखकर मैं ये नही कह सकता था कि तस्वीर उसकी मेरे ताऊ से शादी करने के पहले की थी या पश्चात की.
इन सबकोदेख्ना कुछ कुछ दिलचस्प तो था मगर उतना नही जितना मैने स्थान ढूढ़ने पर सोचा था. मुझे अपने पिता के अतीत से कुछ लेना देना नही था मगर मुझे ताज्जुब था कि ये सभी मेरी मम्मी की नज़रों से कैसे बचा रह गया और यदि उसे मिला तो उसने इनको जलाया क्यों नही. या तो उन्होने नेइसे समान की कोई परवाह नही की थी क्योंकि मेरे पिता भी अब अतीत का हिस्सा बन चुके थे या शायद ये स्थान अभी तक उनकी निगाह से छिपी हुई थी.
इस सभी समान मे जिस चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा वो थीएक बेहद पुरानी काले रंग की जिल्द वाली किताब. वो किताब जब मैने खोलकर देखी तो मालूम चला कि कामसूत्र पर आधारित थी. किताब मे पेन्सिल से स्त्री और पुरुष को अलग अलग मुद्राओं मे संभोग करते हुए दिखाया गया था या पेन्सिल से अलग अलग आसनों में संभोग की ड्रॉयिंग्स बनाई हुई थी. मेरे जवान जिस्म में हलचल सी हुई, मुझे लगा मेरे हाथ में कोई किताब नही बल्कि दुनिया का कोई अजूबा लग गया था.
हमारा गाँव जो सूरत से कोई चालीस किमी की दूरी पर था, कोई 200 परिवारों का आशियाना था. गाँव में खेतीबाड़ी और पशुपालन का काम था. जवान लोग ज़्यादातर सूरत मे काम धंधा करते थे.इसलिये गाँव में मेरे जैसे जवान मर्द कम नही तो ज़्यादा भी नही थे. उस ज़माने में वो किताबएक तरह से मेरे मनोरंजन का खास साधन बन गयी थी. मेरी मम्मी सुबह मे खेतो में काम करती थी और मेरी बड़ी बेहन घर परएक दुकान चलाती थी जो मेरे पिताजी की विरासत थी. दुपहर मे मेरी मम्मी दुकान पर होती और बेहन घर में खाना तैयार करती. मेरा काम था दुपहर मे खेतो मे काम करना और दोबारा अपनी दुधारू गाय भैसो को चारा पानी देना जो अक्सर शाम तक चलता था जैसा कयि बार जानवरों के चरते चरते दूर निकल जाने पर होता है. शाम में हमारा परिवारएक ही रुटीन का पालन करता था. मैं खेतो से बुरी तरह थका हारा मिट्टी से सना घर आता और ठंडे पानी से नहाता. मेरी बेहन मुझे गरमा गर्म खाना परोसती और दोबारा से अपने सिलाई के काम मे जुट जाती जिसमे से उसे अच्छी ख़ासी कमाई हो जाती थी. कई परिवार जिनके मरद सहर में अच्छी ख़ासी कमाई करते थे उनकी औरते महँगे कपड़े सिल्वाती और अच्छी ख़ासी सिलाई देती. मेरी मम्मी शाम को हमारे पड़ोसी और उसकीएक ख़ास सहेली शोभा के घर चली जाती और दोबारा दोनो आधी रात तक गाँव भर की बाते करती.इसलिये मम्मी से सुबह में जल्दी उठा नही जाता था जिस कारण सुबह मेरी बेहन दुकान चलाती थी. मेरी मम्मी खेतो में सुबह को काम करती जो कि काम कम ज़्यादा बहाना था.
अब मेरा संध्या का टाइमकिताब के पन्नो को पलटते हुए बीतता. मैं निकट भविष्य मे स्वयं को उन मुद्राओं में तजुर्बा करने की विचार करता. मगर असलियत में निकट भविष्य मे एसी कोई संभावना नज़र नही आती. मेरे गाँव में और घरो मे पहुँचना जाना कम था, और ना ही मेने किसी को मित्र बनाया था. गाँव में कुछ औरतें थीं जो काफ़ी सुंदर थी मगर ज़्यादातर वो शादीशुदा थी और यदि कोई कुँवारी थी तो ये पता लगाना ज्यादा मुश्किल था कि उसका पहले ही किसी के संग टांका ना भिड़ा हो. हमारी पड़ोसन और मम्मी की फ्रेंड सोभा गाँव की सबसे खूबसूरत औरतों में सेएक थी मगर मम्मी के डर से वो मेरी लिस्ट सेबाहर् थी.
सबसे ज़यादा सुंदर और सबसे जवान हमारे गाँव में मेरी स्वयं की बेहन थी जो अपनीएक अलग ही दुनिय में खोई रहती थी. सौंदर्य और मादकता से भरपूर उसका बदन शायद अपनी मम्मी पर गया था. जी हाँ मेरी मम्मी जो अब 41 वर्ष की हो चुकी थी अब भी ज्यादा बहुत खूबसूरत थी बल्कि पूरनी शराब की तरह उमर बढ़ने के संग साथ उसकी सुंद्रता बढ़ती जा रही थी, उसका रंगरूप और बदन निखरता जाता था. खेतो में काम करने से वो गाँव की और औरतो की तरह मोटी नही हुई थी. यदि आप लोग हैरान हैं कि हमने और लोगों की तरह शहर का रुख़ क्यों नही किया तो इसका सीधा सा जवाब है कि सहर में हमारा कोई जानकार या रिश्तेदार नही है जो हमे कुछ दिनो के लिए सहारा दे सके जब तक हम कोई ढंग का काम कर सकते. मेरे माता पिता हमारे जनम से भी पहले अपने रिश्तेदारों को छोड़ इधर बस गये थे और अब हम बसइसे स्थान जहाँ रहना और गुज़र बसर करना दिन ब दिन मुश्किल हो रहा था फँस गये थे, ना हम ये गाँव छोड़ सकते थे और ना इधर हमारा कोई भविष्य था.
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मेरी बेहन मुझसे चार वर्ष बड़ी थी और अपनीएक अलग दुनिया में रहती थी, वो दुनिया जो उन न्यूज़ पेपर और मॅगज़ीन्स के किरदारों से बनी थी जो हम अपनी दुकान मे बेचते थे. दरअसल हम अपनी दुकान मे दो तीन मन्थलि मॅगज़ीन्स और तीन वीक्ली के अख़बार बेचते थे. ये अख़बारएक हाथ से होता हुआ दूसरे तक पहुँचता जाता जब तक पूरा गाँव इसे सुरू से आख़िर तक पढ़ ना लेता. मॅगज़ीन्स और न्यूसपेपर ज़्यादातर अंत मे वापिस हमारी दुकान पर पहुँच जाते जहाँ मेरी बेहन उनसे सिलाई का कोई नया डिज़ाइन बनाने की प्रॅक्टीस करती. मेरी बेहन अपनीइसे खून पसीने की कमाई को किसी अग्यात स्थान पर हमारी मम्मी से छुपा कर रखती. वो उस दिन का इंतज़ार कर रही थी जब उसके पास इतना रुपया हो जाए कि वो हमारे गाँव को छोड़ किसी दूसरी स्थान जा सके जहाँ उसका भविष्य शायद उसकी कल्पनाओं जैसा सुखद और आनंदमयी हो. लेकिन मैं पूरी तरह बेपरवाह था. स्कूल मैं कब का छोड़ चुका था और किसी किस्म की मुझे चिंता थी नही. मेरा काम सिर्फ़ ये सुनिश्चित करना होता था कि हमारे जानवरों का पेट भरा होना चाहिए ऑर बरसात से पहले खेत जुते हुए होने चाहिए नयी फसल की जुताई के लिए. इसके अलावा मेरा काम था गाँव केबाहर् खुले आसमान के नीचे किसी युवा शेर की तरह आवारा घूमना.
किसी कारण वश मैं किताब को पुनः उसी स्थान रख देता जहाँ मैने उसे खोजा था. अब ये मेरे पिता का छिपाने का गुपत स्थान नही मेरा छिपाने का गुप्त स्थान भी था. वो किताब अब मेरा राज़ थी और उसे मैं हमेशा उसी स्थान छिपाए रखता. हर शाम मैं किताब निकालता और हर सुबह वापिस उसी स्थान रख देता. मैं ना सिरफ़ अपने राज़ की हिफ़ाज़त करता बल्कि उसे उस स्थान मे कैसे कहाँ किस पोज़ीशन मे रखाइसे बात का भी पूरी शिद्दत से ध्यान रखता. इसीलिए ये बात मुझसे छिपी ना रह सकी कि मेरे उस गुपत स्थान की किसी और को भी जानकारी है और मेरे उस राज़ की भी. मैं स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहा था.
मैं जानता था कि वो मेरी मम्मी नही है जिसेइसे स्थान की मालूमात हो गयी थी, ये अवश्य मेरी बेहन थी अथवा वो चीज़ें उस स्थान ना रहती. मेरी मम्मी बिना शक उन सभी चीज़ों को नष्ट कर देती.
मेरी बेहन किताब के संग उतनी ही सावधानी वरत रही थी जितनी मैं. मेरे ख्याल से वो इसे दोपहर में देखती होगी जब मैं खेतों में काम कर रहा होता था. मेरे घर लौटने से पहले वो किताब को वापिस उसी स्थान रख देती हालाँकि मैं इतना नही कह सकता था कि उसेइसे बात की जानकारी थी कि वो किताब मैं भी पढ़ता था. मगर अब समस्या ये थी कि मेरा राज़ अब सिरफ़ मेरा राज़ नही था, अब हम दोनो का राज़ था और ये जानने के पश्चात कि वो उन्ही तस्वीरों को देखती है जिन्हे मैं देखता था और मेरी तरह यक़ीनन वो भी विचार करती होगी स्वयं को उन संभोग की विभिन्न मुद्राओं में बस फ़र्क था तो इतना कि वो स्वयं को उन मुद्राओं में स्त्री की स्थान रखती होगी लेकिन मैं स्वयं को मर्द की स्थान रखता था. इसका नतीज़ा ये हुआ कि उन पोज़िशन्स को आज़माने के लिए मुझेएक पार्ट्नर मिल गयी थी चाहे वो काल्पनिक ही थी. मगर समस्या ये थी कि वो पार्ट्नर मेरी बेहन थी.
ये कुछ ऐसा था जैसे मैं कहूँ कि मुझेएक आसन याएक पोज़िशन में दिलचपसी थी जिसमे पुरुष स्त्री के पीछे खड़ा होता है और स्त्री अपने हाथों और पावं पर चौपाया हो खड़ी होएक घोड़ी की तरह. मेरा लिंग उसकी योनि सेएक या दो इंच की दूरी पर हो और उसके अंदर जाने के लिए तैयार हो. अब मेरी विचार में वो पुरुष मैं था. मैं ही वो था जिसके हाथ उस स्त्री की कमर को पीछे से ज़ोर से पकड़ते हैं, जिसकी पूरी ताक़त उसकी कमर में इकट्ठा हो जाती है और वो तैयार होता हैएक जबरदस्त धक्के के संग अपने लिंग को उस योनि की जड़ तक पेल देने के लिए. अब इसी पोज़ में मेरी बेहन स्वयं को उस स्त्री की स्थान देखती होगी जो अपने पीछे खड़ेएक तक़तबार मर्द से ठुकने वाली हो जिसका लिंग अविस्वसनीय तौर पर लंबा, मोटा हो. मेरी बेहन उस स्त्री की तरह अवश्य मुस्कुराएगी जब उस मर्द का लंबा लिंग उसकी योनि की परतों को खोलता हुआ उसके पेट के अंदर पहुँचेगा और उसका दिल मचल उठेगा.
अब इसे दूसरी तरह से देखते हैं. मान लीजिए मेरी बेहन को वो पोज़िशनपस्न्द है जिसमे मर्द पीठ के बल लेटा हुआ है और स्त्री उसके सीने पर दोनो तरफ़ पांव किए हुए उसके लिंग पर नीचे आती है और उस लिंग को अपनी योनि की गहराइयों में उतार लेती है. मेरी बेहन की विचार मे वो स्वयं वोही स्त्री है जो मर्द के उपर झुकती है और उसके लिंग को अपनी योनि में समेट लेती है. अब मेरी विचार में वो सख्स मैं था जो उसकी चुचियों को मसल रहा था और जिसका लिंग उस गीली, गर्म और अत्यधिक आनंदमयी योनि में डूबा हुआ था. किताब की उस तस्वीर मे मेरी विचार अनुसार मैं वो जीता जागता मर्द था जो उस तस्वीर की स्त्री की योनि के अंदर दाखिल होता है. उसी तस्वीर मे मेरी बेहन की सोच अनुसार वो स्वयं वो जीती जागती स्त्री थी जिसके अंदर किताब का वो मर्द दाखिल होता है. मैं उस स्त्री के अंदर अपना लिंग डालता हूँ और वो मर्द मेरी बेहन के अंदर अपना लिंग डालता है. मैं अपना लिंग डालता हूँ और लेकिन मेरी बेहन डलवाती है.इसे तरह मैं अपनी बेहन के अंदर दाखिल होता हूँ. अपनी बेहन के बारे में ऐसे विचार ऐसे ख़यालात अविस्वसनीय तौर पर कामुक थे और इन विचारों के संग होने वाला अपराध बोध भी अविस्वसनीय था. उस अपराध बोध के बिना अपनी बेहन के अंदर दाखिल होने की मैं विचार नही कर सकता था क्यॉंके मैं अपनी बहन के संग ऐसा नही कर सकता था. अपनी बेहन, अपनी सग़ी बेहन के अंदर दाखिल होने का आनंद किसी दूसरी स्त्री जैसे सोभा के अंदर दाखिल होने से कहीं ज़्यादा था. मेरी बेहन जैसी किसी जवान, खूबसूरत और अल्लहड़ लड़की से संभोग की संभावना शोभा जैसी किसी प्रौढ़ उमर की स्त्री से कहीं ज़्यादा उत्तेजित करने वाली थी. और यदि मैं सोभा के संग संभोग कर सकता था तो निश्चय ही अपनी मम्मी के संग भी कर सकता था. आख़िर उन दोनो की उमर और सूरत सीरत में ज़्यादा फरक नही था. मुझे दोबारा से अपराधबोध का एहसास हुआ और स्वयं पर शरम आई जब मैने कामसूत्र की उन पोजीशंस मे अपनी मम्मी की विचार की. मुझे अपनी कल्पनाओं के संग होने वाला वो अपराध बोध बढ़िया नही लगता. पहले मैं संभोग की उन विभिन्न मुद्राओं को किसी एसी स्त्री के संग भोगने की विचार करता जिसके जिस्म की कोई पहचान नही थी, जो अंतहीन थी, जिसका कोई वजूद संभव नही था मगर अब जो मेरी कल्पनाओं में थी वोएक काया थी,एक देह थी, जिसका वजूद था और उस काया के लिए मेरी कल्पनाएं अदुभूत आनंदमयी होने के संग साथ ज्यादा दर्द देने वाली भी थी. मुझेइसे समस्या का जल्द ही कोई हल निकालना था.
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• अंत मैं मेनेएक हल ढूंड निकाला. मैं अपनी कल्पनायों में अपनी बेहन के जिस्म पर सोभा का सिर रख देता इससे मेरे अंदर का अपराधबोध का एहसास कम होता. अब मैं उस स्त्री को अपनीएक साइड पर लेटे हुए देखता जिसकीएक टाँग हवा में लहरा रही होती तो कैंची के उस पोज़ में उसके संग संभोग करने वाला मर्द मैं होता. मेरी कमर के नीचे या मेरे कंधे पर रखी टाँग मेरी बेहन की होती, बेड पर लेटी नारी की देह मेरी बेहन की होती मगर उसकी चूत, उसका चेहरा शोभा का होता.इसे तरह मैं बिना किसी पाप बिना किसी आत्मग्लानी के उस रोमांच उस आनंद को महसूस करता. जब मैं कुर्सी पर बैठा होता और वो मेरे सामने अपने घुटनो पर खड़ी मेरे लंड को अपने मुँह मे लिए कामुकता और मदहोशी से मेरी आँखो में झाँकती तो वो जिस्म मेरी बेहन का होता मगर वो मुख सोभा का होता जिसके अंदर मैं अपना वीर्य छोड़ता. सीधे लेटे हुए मेरी बेहन की टाँगे मेरी कमर के गिर्द कसी होती मगर मेरा लंड सोभा की चूत के अंदर होता. मैं अपनी बेहन को सहलाता, चूमता मगर चोदता सोभा को.
यहीएक तरीका था जो मुझे मेरे दिमाग़ ने सुझाया था उस आत्मग्लानि को दूर करने का. मैं अपनी बेहन को छू सकता था, चूम सकता था , मगर उसे चोद नही सकता था. कई बार मैने सिर्फ़ रोमांच के लिए सोभा के जिस्म को भोगने की कोशिस की जिस पर चेहरा मेरी बेहन का होता, मगर मैं अपनी बेहन की आँखो मे नही देख सकता था और शर्म से अपना चेहरा घुमा लेता. इसी तरह मेने जाना कि मैं सोभा के जिस्म को चोदते हुए यदि मैं अपनी मम्मी का चेहरा उसके जिस्म पर लगाऊ तो मुझे वो पापबोध महसूस नही होता. मगर मुझे सबसे ज्यादा रोमांच और मज़ा तभी आता जब मैं सोभा के जिस्म पर अपनी बेहन का चेहरा लगा कर कल्पनाओं मे उसे चोदता. मगर जल्द ही सोभा का चेहरा भी गुम होने लगा, अब मेरे ख्यालों में सिर्फ़ मेरी बेहन का जिस्म होता जिसका चेहरा किसी नक़ाब से ढका होता. ये सबसे बढ़कर रोमचित कर देने वाली विचार थी क्यॉंके इसमे मैं सोभा या किसी और के बिना सीधा अपनी अपनी बेहन के संग संभोग करता. नक़ाब के अंदर वो चेहरा मेरी बेहन का भी हो सकता था या किसी और का भी मगर ढका होने की वजह से मुझे कोई चिंता नही थी. अब मेरी कल्पनाओं में यदि कभी मेरी बेहन का मुस्कराता चेहरा मेरी आँखो के सामने आ जाता तो मैं अपनी शरम को नज़रअंदाज़ कर देता, अब मैं अपनी बेहन कोएक नयी प्रकाश में देख रहा था.
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और ये जानकर कि मेरी बेहन उन्ही तस्वीरों को देखती है जिन्हे मैं देखता था और शायद मेरी तेरह ही वो भी उन पोज़ो मैं स्वयं की विचार करती थी, मैंएक तरह से ये जानने के लिए हद से ज़्यादा व्याकुल हो उठा था कि वो किन पोज़िशन्स या मुद्राओं में स्वयं को चुदवाने की विचार करती थी. मैं अधीर था ये जानने के लिए कि कामसूत्र की उस किताब में उसकी सबसे पसंदीदा पोज़ीशन कॉन सी है. मेरी इच्छा थी कि मेरी कल्पनाएं बेकार के अंदाज़ों मे भटकने की बजाए ज़्यादा ठोस हों और ज़्यादा केंद्रित हो और ये तभी मुमकिन था जब मुज़े ये पता चलता कि उसके ध्यान का केंदर बिंदु कॉन सी पोज़ीशन है ताकि मैं भी उसी पोज़ीशन पर ज़्यादा ध्यान दूं, उस पोज़िशन पर ज़्यादा टाइमब्यतीत करूँ औरों की तुलना में.
पर अब समस्या ये थी कि मैं सीधे मुँह जाकर उससे तो पूछ नही सकता था कि बेहन तुम किस आसान में चुदवाने के सपने देखती हो. असलियत में तो हमे ये भी मालूम नही होना चाहिए था कि दूसरा हमारे राज़ को जानता है. मैं जानता था कि वो भी अवश्य उस किताब को पढ़ती थी, इसी तरह शायद वो भीइसे बात से अंजान नही थी कि मैं भी उस किताब को पढ़ता था. मगर ये बात हमएक दूसरे के सामने मान नहीं सकते थे, कबूल नही कर सकते थे, ये ज्यादा ही शर्मशार कर देने वाली बात होती.
क्रमशः.
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