यह कहानी काल्पनिक ही नही पर ज्यादा लंबी भी हो सकती है। ये कहानी है मानव शाह की जिसे धोखे और दर्द ने दानव बनाया। क्योंकि ये कहानी मानव के पिता से शुरुआत होती है में मानव के पिता से शुरुवात करूंगा। यदि आप को पात्रों की उम्र का अनुमान लगाना चाहें तो वयस्क पत्रों के संग हिसाब लगाकर देख लें।
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1
धीरज शाह सूरत के बड़े हीरे के कारोबार को मुंबई से पूरी दुनिया में ले जाने के सपने से 21 वर्ष की उम्र में 1960 में आया। अपने बेटे को मुंबई की चकाचौंध में खोने से रोकने के लिए उसके घरवालों ने उसकी शादी अपने वफादार कारागीर की सबसे बड़ी बेटी से करा दी। 18 वर्ष की वह शर्मीली लड़की अपने पति को अपना ईश्वर मान कर उसके संग आ गई।
धीरजएक चालाक और बेरहम कारोबारी निकला और उसने आते हीएक अच्छे कारोबारी के संग मिलकर अपनी कंपनी बनाई। धीरज ने अपनी शर्मीली पत्नी से वही बरताव किया जिसकी उसकी पत्नी को उम्मीद थी। पत्नी घर और 1 नौकर संभालती तो धीरज दुनिया घुमाता।
धीरज की पत्नी नेएक वर्ष के अंदर अपना फर्ज निभाते हुए धीरज को बेटा दिया और 22 वर्ष के धीरज ने अपने फलते फूलते कारोबार को याद रख कर उसका नाम हीरेश रखा।
हीरेश की मम्मी न सिर्फ मन से कमजोर थी पर स्वास्थ से भी कमजोर थी। धीरज कारोबार में व्यस्त था पर उसकी पत्नी की कमजोरी बढ़ती जा रही थी। 6 वर्ष पश्चात धीरज को अपनी पत्नी की बिगड़ती स्थिति का अंदाज आया और उसने अपनी पत्नी के लिए बड़ा घर, ज्यादा नौकर और डॉक्टरी ईलाज करवाया। अफसोस पर शादी की दस वर्ष में ही धीरज की पत्नी उसे बेटा दे कर चल बसी।
अपने पिता और ससुर के समझाने पर धीरज ने अपनी सबसे छोटी साली के संग शादी कर ली ताकि उसके बेटे को मम्मी की कमी न हो। 31 वर्ष के धीरज की दूसरी पत्नी 18 वर्ष की माया थी। फिर भी माया ने अपनी बड़ी बहन के बेटे को अपने प्रेम में लेने की ज्यादा कोशिश की पर हीरेश को अपनी सौतेली मम्मी में अपने पिता के संग को बांटने का गुस्सा था।
शादी के कुछ दिन पश्चात धीरज काम में डूब कर दोपहर का खाना खाने नही आया तो माया ने उसे शाम को खूब खरी खोटी सुनाई और रात को भूखे पेट सोने पर मजबूर किया। धीरजएक स्वतंत्र विचारों का पुरुष था और उसे अचानक एहसास हुआ कि उसे जिद्दी और स्वतंत्र विचारों की औरतेंपस्न्द हैं।
कितनी शर्मनाक बात थी की मुंबई के अमीर और 31 वर्ष के जवान सेठ को अपनी ही पत्नी से प्रेम हो गया। बेचारा ऐसे लट्टू हो गया कि दोस्तों के मजाक और चिढ़ाने से भी उस पर कोई असर नहीं पड़ा। पर उस चिढ़ाने से छोटे हीरेश पर असर पड़ा। उसे लग रहा था कि उसके पिता को माया उस से चुरा रही थी।
19 वर्ष की उम्र में माया ने 32 वर्ष के धीरज के हाथ में उसका दूसरा बेटा दिया तो धीरज का दिल भर आया। अपने अंदर मानवी जज्बात को मानते हुए अपने दूसरे बेटे का नाम मानव रखा। दो बेटों में 10 वर्ष की दूरी बुरी बात नहीं थी पर हीरेश के लिए ये उसके पिता काएक और बंटवारा था।
जब धीरज 40 वर्ष का हुआ तो 18 वर्ष के जवान हीरेश ने अपने पिता को कारोबार में मदद करना शुरुआत कर दिया। फिर भी धीरज अब भी 27 वर्ष की सुडौल माया के प्रेम में पागल था पर बेटे के संग कारोबार बढ़ाने के अपने मजे होते हैं। जल्द ही कारोबार के संग धीरज मुंबई को हीरेश के हाथों में सौंप कर स्वयं अनेक मुल्कों में अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए घूमने और लंबे वक्त तक रहने लगा।
30 वर्ष की उम्र में माया को न जाने कौनसी बीमारी लग गई और वह खोई खोई रहने लगी। अपने आप को कमरे में बंद रखने लगी। हीरेश को छोड़ वह किसी और सेे मिलती नहीं थी।
छोटे से मानव को अपना बड़ा भाई सबसे बढ़िया लगता था। वह अपने बड़े भाई जैसा रौबदार तगड़ा जवान बनने के लिए अपने फैमिली डॉक्टर से मिला।
27 वर्ष के जवान डॉक्टर सोलंकी ने अपने बूढ़े ससुर से उसका अस्पताल पाया था और वह अक्सर हीरेश को ताकत की गोलियां देता था। जब 6 कक्षा के मानव ने भी ताकत की गोलियां मांगी तो डॉक्टर सोलंकी ने उसे राज़ रखने की कसम दिलाते हुएएक थैली भर कर VE5000 गोलियां दी। ये गोलियां अजीब हरे रंग की 2 इंच लंबी और मोटी थी।
गोलियों से मानव की कद काठी अचानक बढ़ने लगी पर संग ही वह ज्यादा ज्यादा ताकतवर और गुस्सैल हो गया। मानव को अपने गुस्से पर काबू नहीं रहा और वह अपने से बड़े लड़कों की टोली को भी अकेले धूल चटाने में माहिर हो गया था। यदि मानव के गुस्से को कोई शांत कर पाता तो वह थी मोहिनी।
मोहिनी धीरज के बिजनेस पार्टनर की इकलौती संतान थी और गुस्से से उबलते मानव का सहारा। मोहिनी कीएक आवाज गुस्से में पागल मानव को ऐसे रोक देती जैसे शेर को बंदूक से निकली नींद की दवा। फिर भी मानव ने अपने गुस्से और ताकत का राज़ किसी से नहीं कहा पर स्कूल के मास्टर शास्त्री सर नेइसे लड़के को अपनी शरण में ले लिया।
शास्त्री सर ने मानव को chess boxing में लाया जहां पहले 1 दांव chess का होता है तो दूसरा boxing का। जितने के लिए जोश और होश दोनों जरूरी है। मानव से लड़ने के लिए खास तौर पर यूनिवर्सिटी के चेस और बॉक्सिंग चैंपियन को बुलाया जाता।इसे से मानव अपने गुस्से और ताकत पर काबू पाने में कामयाब हुआ और स्कूल की शिक्षा ख़त्म होने तक गोलियों पर भी प्रश्न उठने लगा। मानव ने आखरी गोलियां न खाते हुए संभाल कर रख दी। इन्हे देख कर वह स्वयं को याद दिलाता की वह किसी चीज के नियंत्रण में नहीं जायेगा।
मानव की दसवीं की परीक्षा आते आते माया पूरी मुरझा गई थी। ऐसी अफवाएं भी उड़ रही थी कि माया का पराए मर्द संग कुछ गलत संबंध बन गया है। मानव अपनी आखरी परीक्षा देकर निकला भी नहीं था जब उसे प्रिंसिपल ने अपने दफ्तर में बुलाया। दफ्तर में एडवोकेट कमलाकर को देख कर मानव चौंक गया।
एडवोकेट कमलाकर, "मानव बेटा मेरे पास वक्त नहीं हैइसे लिए गौर से सुनो और किसी से कुछ मत कहना। तुम्हारी मम्मी और मेरे बारे में कई गलत बातें बोली जा रही हैं पर सच्चाई तो ये है कि माया मेरी मुंह बोली बहन है। पिछले कुछ सालों से उसके संग जो हो रहा है वह बता नही सकती पर उसने तुम्हारे लिए मेरे पासएक संदेश दिया है। जिस दिन तुम 18 वर्ष के हो जाओ, उस दिन से कभी भी तुम बांद्रा के State Bank of India के सेफ्टी डिपॉजिट बॉक्स को खोल कर अपनी मम्मी के बारे में जान सकते हो।"
मानव, "तो वह अब क्यों नही बताती?"
कमलाकर, "कल तक वह मजबूर थी और आज वह आजाद है। तुम बस इतना याद रखना की खून के रिश्ते कभी कभी खून के प्यासे हो जाते हैं। मैं आज ही ऑस्ट्रेलिया जा रहा हूं, हमेशा के लिए। अपना खयाल रखना।"
कमलाकर भूत की तरह भाग गया और मानव के कुछ सोचने से पहले वहां 25 वर्ष का गुस्से में आग बबूला हीरेश आ गया।
हीरेश, "उस दो कौड़ी की हरामी रण्डी से छत से कूद कर जान दे दी है। तुझ जैसे सपोले को मेरे गले में मार कर भाग गई।एक काम बोला था उस फटी हुई चूत को पर वो भी नहीं कर पाई। अब मेरा मुंह क्या देख रहा है? चल तेरी मम्मी को जमीन से उठने का काम तुझे करना है। उस दो टके की रांड को मैं नहीं उठाने वाला।"
मानव को अचानक समझ में आ गया की उसकी मम्मी कैसे आजाद हो गई थी और कमलाकर ने खून के रिश्ते के बारे में क्या कहा था। मानव रो रहा था पर हीरेश उसे खींचते हुए उसके घर ले आया। खुश किस्मती से माया को लोगों ने उठाकर अस्पताल लाया था जहां डॉक्टर सोलंकी ने बताया कि ड्रग्स लेने के कारण नशे में ये हादसा हुआ है।
माया की मौत से धीरज टूट गया और हीरेश पर ज्यादा निर्भर रहने लगा। अब हीरेश ने कारोबार चलाने का काम लिया और धीरज मुंबई ऑफिस में रहने लगा। जब मानव ने हीरे जवाहरात के धंधे में रुचि दिखाई तो हीरेश ने उसे नशेड़ी की औलाद कह कर कारोबार से दूर रहने को कहा। मानव ने अपने बूढ़े नाना के पास दसवीं पास होने तक हीरे जवाहरात को काटना चमकाना और तराशना सीखा।
जब मानव 18 वर्ष का हुआ तो उसे अपने पिता को याद दिलाना पड़ा की आज वह बालिक हो गया है। धीरज ने गहरी सांस लेकर मानव से पूछा की वह क्या चाहता है तो मानव ने अपने पिता से मोहिनी के लिए बात की। बचपन की दोस्ती कब प्रेम बन गई ये मानव को पता भी नहीं चला था पर अपनी मम्मी को खोने के पश्चात मानव अपने प्रेम को खोने को तयार नहीं था। जब ये बात हीरेश को पता चली तो वह ज्यादा गुस्सा हो गया। हीरेश को लगा की मोहिनी से शादी कर के मानव अपने हिस्से के संग मोहिनी का हिस्सा भी लेगा।इसे से कारोबार में उसके पास 75% की मिल्कियत ही जायेगी।
हीरेश ने धीरज को समझाया की मानवएक नशेड़ी स्त्री की औलाद है और अपने पार्टनर से गलती से भी धोखा करने से पहले मानव को डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए। मानव को डॉक्टर सोलंकी के पास भेजा गया।
डॉक्टर सोलंकी ने नशे के इंजेक्शन के निशान ढूंढे के लिए मानव को सारे कपड़े उतारने को कहा। मानव को देख कर डॉक्टर सोलंकी हैरान रह गया।
मानव के लंबे चौड़े बदन के संग उसके गुप्त अंग भी ज्यादा बड़े थे। डॉक्टर सोलंकी समझ गया कि उसकी ताकत की गोलियां से मानव का ये हाल हुआ है।
मानव का लौड़ा 14 इंच लम्बा और 5 इंच मोटा था। मानव के गोटे किसी टेनिस बॉल की जोड़ी की तरह शान से भर कर लटक रहे थे।
डॉक्टर सोलंकी ने मानव से कहा कि वह बिलकुल स्वस्थ है और उसे कोई बीमारी नहीं पर वह कभी स्त्री के संग संबंध नहीं बना सकता। मानव का हथियार इतना विशाल है कीइसे से चुधने वाली स्त्री दूसरे दिन का सूरज नहीं देख पाएगी।
डॉक्टर सोलंकी ने धीरज को बताया कि उसका बेटा किसी भी स्त्री के संग शारीरिक संबंध बनाने के लायक नहीं है। हीरेश ने पिता को समझाया कि इसका मतलब मानव नामर्द है और दोस्ती के लिए धीरज को मोहिनी की शादी हीरेश से करवानी चाहिए।
मानव को अपने भाई की मोहिनी से शादी होने से पहले हीरों की पढ़ाई के लिए धीरज ने Amsterdam भेजने का तय किया। फिर भी उसे हीरेश ने मानव पर पैसे जाया करने से रोका पर धीरज नही माना। जब मानव को सारी बात पता चली उसे डॉक्टर सोलंकी पर शक यकीन में बदल गया।
मानव ने मोहिनी से छुप कर मिलते हुए गिड़गिड़ाकर कहा कि वह अपने मित्र पर विश्वास करते हुए 3 वर्ष रुके। 21 वर्ष के होते ही मानव अपनी मोहिनी के लिए लौटेगा और यदि उस टाइममोहिनी मानव कोपस्न्द नहीं करती तो मानव स्वयं उसकी शादी उसकेपस्न्द के लड़के से करवाएगा।
मोहिनी अपने मित्र पर विश्वास करती थी पर अपने पिता को मना नहीं कर सकती थी। वह मानव को छोड़ हीरेश से शादी करने को तैयार थी। मानव से उसका आखरी सहारा भी छुट गया।
अगले दिन सुबह जल्दी मानव कमलाकर ने बताए बैंक में पहुंचा तो ब्रांच मैनेजर ने उसके बालिक होने का सबूत देख कर उसे उसकी चाबी सौंपी दी। मानव ने अपना सेफ्टी डिपॉजिट बॉक्स खोला तो अंदर उसके घरके handycam की कैसेट्स मिली और उनके नीचेएक बंद लिफाफा भी था।
हर कैसेट पर तारीख लिखी हुई थी और लिफाफे पर माया की मौत सेएक दिन पहले की तारीख थी। मानव अपनी मम्मी का आखरी पैगाम लेकर पुनः आया और अपने कमरे में स्वयं को बंद कर लिया।
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2
मानव ने कैसेट में से पहली कैसेट निकाली और टीवी से जोड़ कर देखने लगा।
***
जून 1982
30 वर्ष की बेहद खूबसूरत माया हाथ में आराधना की थाली लिए हाल में आ गई और 21 वर्ष के आकर्षक हीरेश को देख कर चौंक गई।
माया, "अरे हीरेश, तुम कब से मंदिर और आराधना करने लगे?"
हीरेश मुस्कुराकर, "अरे मम्मी, मेरे मित्र ने जबरदस्ती मुझेएक बड़े बाबा से मिलवाया। वहीं से आ रहा हूं।"
माया, "वैसे भी धंधे में काम करने से पहले माथे पर तिलक बढ़िया होता है। वैसे ये बाबा कौन है? देखो किसी ढोंगी बाबा के बहकावे में मत आना।"
हीरेश, "मम्मी ये बाबा बड़े पहुंचे हुए स्वामी जी हैं। इन्हे पापियों के पाप मिटाने की सिद्धि प्राप्त है। ये देखिए उनका प्रसाद, आप भी लीजिए।"
माया हिचकिचाते हुए, "अब मैंने कौनसा पाप किया है जो बाबाजी को मिटाना पड़ेगा?"
हीरेश, "सिर्फ चोरी और हत्या ही पाप नहीं होते। वैसे भी प्रसाद बांट कर खाना चाहिए। बस बाबाजी की गोली को पूरा निगल जाना है। उसे जबान या दांत छू जाना माना है।"
माया ने अनमन से गोली निगल कर अपना प्रसाद हीरेश को दिया।
माया, "हीरेश, तुम्हारे पिता आज सुबह ही यूरोप के लिए गए हैं औरएक महीने तक वहीं रहेंगे। तुम शाम को टाइमपर आना। मानव तुमसे मिलने के लिए उतावला रहता है। तुम दोनों भाइयों का प्रेम देख कर मुझे ज्यादा खुशी होती है।"
हालांकि माया को नजर नहीं आया पर मानव को अपने भाई के चेहरे पर आए गुस्से के जज्बातों चमक कर जाते हुए नजर आए।
कुछ कदम चलने पर माया अचानक कांपने लगी और उसके हाथों से आराधना की थाली गिर गई। हीरेश ने भाग कर माया को अपनी मजबूत बाहों में भर लिया।
माया, "ये क्या हो रहा है, हीरेश? मेरा सर चकरा रहा है! मेरा पूरा बदन जैसे हवा में उड़ रहा है! चारों ओर इंद्रधनुष चमक रहे हैं? ये क्या है हीरेश? मुझे डॉक्टर के पास जाना होगा!"
हीरेश, "अरे नहीं मम्मी। ये तो बाबा मस्तराम के आशीर्वाद का असर है। आप के सारे पाप उड़ गए हैं और आप की आत्मा बोझ से हल्की होने से उड़ रही है। आप कुछ समय के लिए लेट जाएं।"
हीरेश माया को अपनी बाहों में लेकर बेडरूम में ले गया।
***
अगले दिन
हीरेश को पुनः प्रसाद लाते हुए देख कर माया चौंक और डर गई।
माया, "ना बाबा, ना। मैं ये प्रसाद नहीं खा सकती। कल तो मेरी हालत खराब हो गई थी। तुम्हे अपने कोई पाप धोने हो तो अंदर मंदिर में हाथ जोड़ कर मन से भक्ति करो।इसे बाबा मस्तराम से तो मुझे डर लगता है।"
हीरेश, "मम्मी आप भी ना! आप को पता नहीं था कि बाबा मस्तराम का प्रसाद कितना शक्तिशाली होता हैइसे लिए लड़खड़ाए। वैसे भी धंधे में पाप तो होते रहते हैं और प्रसाद परिवार बांट कर खाता है।"
माया प्रसाद खाने तो तयार नहीं हो रही थी तो हीरेश ने अपना छुपा हुआ हथियार निकाला।
हीरेश, "अगर आप नही खायेंगी तो मुझे ये मानव के संग बांटना होगा।"
मानव को बचाने के लिए माया मान गई और प्रसाद की गोली निगल गई। माया बगल में सोफे पर बैठ गई। कुछ ही पलों में माया का बदन ढीला पड़ गया और उसके बदन पर पसीने की चमक आ गई। माया अपनी आंखे बंद करके पड़ी गहरी सांसे ले रही थीं लेकिन हीरेश किसी भूखे भेड़िए की तरह नफरत भरी आंखों से उसे देख रहा था।
***
कुछ दिनों बाद
माया गुस्से में हाल में घूम रही थी। उसने सभी नौकरों को भगा दिया था। हीरेश ने जैसे ही हॉल में कदम रखा माया ने उसके शर्ट को पकड़ लिया।
माया, "आज इतनी देर क्यों लगा दी!! बाबा मस्तराम के प्रसाद के बिना मैं अपने दिन की शुरुवात नहीं कर सकती। लाओ! लाओ वो प्रसाद! मुझे प्रसाद चाहिए!!"
हीरेश (एक गंदी मुस्कान देते हुए), "माफ करना मम्मी पर बाबा मस्तराम ने आप को प्रसाद देने से मना किया है। उन्होंने कहा कि ये प्रसाद सिर्फ पापियों के लिए है। आप ने बिना पाप किए ये प्रसाद खाया तो जल्द ही आप के सारे पाप मिट कर आप स्वर्ग सिधार जाएगी। तो आप की जान बचाने के लिए मैं आप को प्रसाद नहीं दे सकता।"
माया गुस्से से लाल हो गई।
माया, "मैं पापी हूं। मैने कल ही तुम्हारे बटवे से 10 रुपए चुराए थे। मुझे प्रसाद दो! मुझे प्रसाद दो! मुझे प्रसाद चाहिए!!"
हीरेश, "मम्मी, आपइसे घर की रानी है।इसे घर की हर चीज आपकी है। तो दोबारा आप का कुछ चुराना मतलब अपनीएक जेब में से दूसरी जेब में रखना। इसे कोई भी चोरी या पाप नही बोलेगा! आप को यदि पाप करना है तो कुछ ऐसा करना होगा जो स्वच्छ तौर पर मना किया गया है।"
माया प्रसाद के लिए गिड़गिड़ाने लगी तो हीरेश ने उसे पाप करने का सुझाव दिया।
हीरेश, "वैसे पाप करने काएक तरीका है। यदि आप किसी पराए मर्द से संबंध बना ले तो ये पाप होगा।"
माया हैरान रह गई। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका बेटा उसे ऐसा कुछ करने को कह रहा है। लेकिन हीरेश इतने पर रुका नहीं।
हीरेश, "पापा अक्सर महीनों तक विदेश में रहते हैं तो ये मुमकिन है कि वह जर्मनी और Amsterdam की वैश्या महिलाओं का भी आनंद लेते होंगे। तो किसी भी पराए मर्द संग संबंध बनाना पाप नही पर इंसाफ होगा। आप को पक्का पाप करने के लिए किसी ऐसे मर्द संग संबंध बनाना होगा जो हर तरह से गलत हो। आप को मेरे संग सेक्स करना होगा।"
माया, "तुम पागल हो गए हो। बाबा मस्तराम ने तुझे पागल कर दिया है। तुम अपनी मम्मी से ऐसी बात कैसे कर सकते हो?"
हीरेश, "ठीक है। मैं चला जाता हूं। लेकिन पाप नहीं तो प्रसाद नहीं।"
माया बाबा मस्तराम के प्रसाद के लिए तड़प रही थी। माया ने आखिर में मरने पर उतारू हो कर हीरेश की बात मान ली।
माया, "मैं… मैं… मैं तुम्हें हिला कर दूंगी। हिला कर तुम्हारा पानी अपने हाथ में लूंगी।एक मम्मी के लिएइसे से बुरा क्या होगा?"
हीरेश (शैतानी मुस्कान देते हुए), "ठीक है। मैं कल बाबा मस्तराम की अनुमति से तुम्हे प्रसाद दूंगा।"
माया ने हीरेश को पकड़ कर सोफे पर बिठाया और उसके कपड़े उतारने लगी।
माया, "कल नही! आज! अभी!! मुझे प्रसाद चाहिए!"
माया ने हीरेश की पैंट खोली और उसके कच्छे को नीचे किया। हिरेश का 5 इंच लम्बा और डेढ़ इंच मोटा लौड़ा छत की ओर इशारा करता खड़ा था। माया की आंखों में बेबसी के आंसू थे। माया ने अपनी आंखें बंद करके अपने पति की मांफी मांगी और हीरेश के जवान गर्म लौड़े को अपनी उंगलियों से छू लिया।
हीरेश ने अपने सपने को साकार होते देख कर आनंद लेने की ठान ली। माया की उंगलियों ने हीरेश की 5 इंची लंबाई को छू कर सहलाया और धीरे-धीरे से उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया।
हीरेश, "मम्मी, बाबा मस्तराम ने कहा है कि यदि कोई इंसान मजबूरी में गुनाह करे तो वह पाप नहीं होता। अगरइसे में आप को आनंद नही आया तो ये पाप नहीं है। पाप के बिना प्रसाद पर आपका कोई हक नहीं है।"
माया ने डर कर, "तो मुझे और क्या करना होगा?"
हीरेश, "जैसे आप मुझे सहला रही हैं वैसे मैं भी आप को सहलाऊंगा।"
माया ने रोकने की कोशिश की तो हीरेश उठ कर जाने लगा। माया को हीरेश की बात माननी पड़ी।
माया भी सोफे पर हीरेश के बगल में बैठ गई। हीरेश की नजर सीधे कैमरा में गई और वह मुस्कुराया। ये कैमरा हीरेश ने लगवाए थे।
माया ने अपनी उंगलियों में हीरेश के लौड़े को लेने की कोशिश की पर हीरेश ने जिद्द कर पहले माया की साड़ी उठाई और अपने दाहिने हाथ को माया की पैंटी में डाल दिया।
माया बाबा मस्तराम के प्रसाद के लिए तड़पती हीरेश को रोकने में नाकाम रही। हीरेश की उंगलियों ने माया की सुहागन चूत को सहलाते हुए उसकी जवानी को मजबूर किया। माया की जवानी ने पराए मर्द के बुलावे पर अंगड़ाई ली।
माया ने हीरेश से लड़ने के बजाय हीरेश के ताल में उसका लौड़ा हिलाना शुरुआत किया। हितेश की उंगलियां तेजी से घूमती हुई माया की जवानी को भड़का कर झड़ने को मजबूर कर रही थी। हीरेश ने यकीनन सुबहएक बार मूठ मारी थी जिस वजह से वह माया की कोशिशों के पश्चात भी टीका रहा।
अचानक माया का बदन कांपते हुए अकड़ने लगा और माया ने झड़ते हुए अपनी मुट्ठी में हीरेश के लौड़े को कस कर पकड़ लिया। माया झड़ने लगी और हिरेश का भी वीर्य लौड़े की जड़ पर अटक कर जोरों से धड़कने लगा। माया झड़ कर ढीली पड़ गई और हितेश का पानी फूट पड़ा।
माया ने अपनी हथेली में हीरेश का पानी पकड़ लिया और उसे दिखाया।
माया, "अब तो मैने पाप किया है। अब तो मुझे बाबा मस्तराम का प्रसाद दे दो।"
हीरेश ने अपनी सौतेली मम्मी की आंखों में देख कर जेब में सेएक गोली निकली और अपने वीर्य से भरी हथेली में डाल दी।
माया बाबा मस्तराम के प्रसाद के लिए इतनी उतावली हो गई थी की उसने वह गोली हीरेश के वीर्य के संग ही पी ली। कुछ ही पलों में गोली का असर होने लगा और माया वहीं सोफे पर सर रखते हुए जमीन पर बैठ गई।
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