बलात्कार
कैसे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनो में बदल गये, मानो पता ही नहीं चला. अचानक हीएक दिन रूपाली को एहसास हुआ कि हवेली के चारों तरफ झाड़-घास-फूस बढ़ गये हैं. रूपाली को स्वयं पर गुस्सा आने लगा कि क्यूँ इतने वक़्त से उसने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया.
आँगन में आकर उसने चंदर को आवाज़ लगाई,”चंदर……ओ चंदर.” तभी उसने देखा वो पेड़ के नीचे बैठा है और पेड़ पे बैठे कबूतर को एकटक निहार रहा है. एकदम गुम सूम…….रूपाली को गुस्सा आ गया. वो पास गयी और चिल्लाते हुए चंदर से कहने लगी कि उसकी आँखें फुट गयी हैं क्या? उसे रोज़ सफाई करते रहना चाहिए ताकि हवेली सॉफ सुथरी बनी रहे. हाथ हिला हिला कर उसने चंदर को सफाई करने के लिए कहा.
चंदर नेएक नज़र उसकी तरफ देखा और रूपाली ने देखा चंदर की आँखों में रूपाली के लिए सिर्फ़ नफ़रत थी. वो अचानक उठा और तेज़ी से भौचक्की सी रूपाली के आगे से निकल गया और दूर कहीं गुम हो गया. रूपाली के होंठो तक चंदर के लिएएक भद्दी से गाली आई, पर वो मंन मार कर रह गयी.
रूपाली नेएक नज़र आसमान की ओर देखा….कोई शाम के 6 बज रहे थे. उसके दिमाग़ में ख़याल आया, क्यूँ ना वो खेतों की तरफ जाए और यदि वहाँ कोई मज़दूर दिख जायें तो उनके संग अगले दिन के लिए हावीली की आस पास सफाई का काम तय कर ले. उसे ये विचार बढ़िया लगा.
अंदर आई और उसने जल्दी जल्दी अपने लंबे, घने बालों को संवारा, बगल में खुशबूदार फ्रांसीसी खुश्बू लगाई जो उसको कभी ससुर शौर्या सिंग ने दी थी….हल्के गुलाबी रंग का ब्लाउस पहना और गुलाबी सी साड़ी भी. शीशे में देखा, ज्यादा अच्छी लग रही थी रूपाली.बाहर् पसीना आने का ख़तरा था,इसलिये रूपाली ने अपने गालों, गर्देन और ब्लाउस के अंदर हल्का सा पॉंड्स पाउडर लगा लिया. रूपाली नेएक बार स्वयं को निहारा….और किसी 17 वर्ष की लड़की की तरह शर्मा के रह गयी……वाकई ज्यादा खूबसूरत लग रही थी वो.
हवेली से चलते चलते काफ़ी दूर आ गयी थी रूपाली. इक्का दुक्का गाओं के बूढ़े उसको हुक्का पीते हुए नज़र आए और जैसे ही उन्होने ठकुराइन को देखा, अचकचा कर, “प्रणाम ठकुराइन”, कह कर उसका अभिवादन किया. रूपाली को बढ़िया लगा कि आज भी हवेली का इतना रुतबा है. उन बूढ़े लोगों से काम के लिए कहना बेकार था,इसलिये वो आगे निकलती चली गयी.
सूरज ढालने लगा था और उसकी लालिमा चारों ओर फेल रही थी. रूपाली का चेहरा भी तपिश के कारण चमचमा उठा था और हल्का पसीना माथे पे मोती की तरह चमक रहा था. रूपाली को लगा अब कोई नहीं मिलेगा और उसे पुनः हवेली की ओर चलना चाहिए. मुड़ने की वाली थी की उसे लगा उसे कुछ आवाज़ें सुनाई दी हों.
आवाज़ खेतों की तरफ से आई थी. रूपाली के कदम उसी तरफ बढ़ गये. अचानक उसे किसी मर्द के हँसने की आवाज़ आई और दोबारा से कुछ अस्पष्ट आवाज़ें. खेत गन्ने के होने की वज़ह से ज्यादा घना था……अचानक रूपाली को लगा उसने चूड़ियों के टूटने की आवाज़ सुनी और फिरएक लड़की की चीख आई,”ना कर सत्तू चाचा, हाथ जोड़ू तेरे….” औरएक गुर्राहट भरी मर्दानी आवाज़,”चुप्प साली…”…….और तभी रूपाली के आगे सारा नज़ारा सॉफ था…
गाओं में जात-पात थी. ऊँची जात वाले ब्राह्मण और ठाकुर, गाओं की उपरि ओर रहते थे, और सभी डोम-चमार-कहार, नाई, गाओं की निचली ओर. सारा मामला निचली जात का था. 2 काले कलूटे, 40 वर्ष से उपरि के चमारों नेएक 20-22 वर्ष की मांसल से लड़की के हाथ पकड़ रखे थे औरएक 50 वर्ष से उपरि का कलूटा उसके पैरों को खोल कर, अपना काला लंड लड़की की बुर में घुसाने की कोशिश कर रहा था.एक और 45-50 वर्ष का अधेड़, साँवले रंग का बुज़ुर्ग ये सभी ऐसे देख रहा था मानो कोई किसी गाय को चारा चरता हुआ देख रहा हो.
“ना कर सत्तू चाचा, जान दे, मैं तेरी मौधी (बेटी) जैसी हूँ रे….”…….”चुप्प कमला साली……हमरी मौधी ऐसे गांद ना फिराती फिरे गाओं भर में….अब चोद्ने दे नाहीं तो चीर देई तोहरा के….”…ये कहते हुए उसनेएक असफल कोशिश और की. मगर लड़की बदन सेमजबूत थी और उसकी टांगे अलग होने का नाम नहीं ले रही थी. झल्लाहट में सत्तू नेएक झापड़ रसीद दिया. कमला ज़ोर से रोने लगी,”हाए दैयया रे….कोई बचाआऊऊ……बचहाआआााऊऊ.” खेत गाओं से इतनी दूर थे कि किसी के आस पास होने का प्रश्न ही नहीं था. तीनो कलूटों ने उसका मुँह बंद करने तक की ज़हमत नहीं उठाई और हंसते रहे.
“क्या हो रहा है ये???.बंद करो….सालो”, किसी बूखी शेरनी की तरह रूपाली गुर्राते हुए चीखी औरएक समय के लिए मानो वक़्त थम गया था…….सब सुन्न रह गये थे. ना कमला चीखी, ना सत्तू कुछ बोला और चारों मर्द रूपाली को ऐसे देख रहे थे मानो पूछ रहे हों,”आप कौन हैं?” सांवला आदमी, जिसकी उमर 45-50 के बीच थी, धीरे-धीरे से बोला,”सत्तू, कालू, मोतिया……ये हवेली की ठकुराइन हैं……परणाम ठकुराइन.”. तीनो कल्लुओं ने घबराहट में कमला को छ्चोड़ दिया जो अपने कपड़े झाड़ते हुए उठी और भाग के रूपाली के पीछे जा छुपि.
“तो ये सभी हो रहा है हमारे गाओं में अब? हैं? कोई शरम लाज नहीं है आप लोगों को?”, किसी बिफरी हुई शेरनी की तरह रूपाली आग उगल रही थी. “कौन हे रे तू?” रूपाली ने कमला से पूछा तो पता चला वो झूरी मल्लाह की बेटी है और मोतिया उसे सस्ती साड़ी वाले से मिलवाने के बहाने फुसला के गाओं से कुछ दूर लाया था, जहाँ कालू और सत्तू ने उसको पकड़ लिया और तीनों उसको खेत की ओर ले आए थे. बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना वाली हालत थी साँवले मुंगेरी की और वो ऐसे ही इन तीनो के संग हो लिया था की कुछ देसी शराब पी लेगा और कुछ चने खा लेगा. चारों 2 बॉटल देसी शराब गटक चुके थे और उन्होने कमला को भी ज़बरदस्ती शराब पिलाने की कोशिश की थी, पर उसने सभी शराबबाहर् थूक दी थी. उन्होने शराब बर्बाद करने से बढ़िया सोचा साली को बस कुछ देर पकड़ कर रखें और दोबारा नशे के सुरूर में चुदाई का प्रोग्राम चालू ही किया था की रूपाली ने आकर सभी गुड-गोबर कर दिया.
रूपाली ने चिल्ला कर कहा,”चल कमला तू मेरे साथ…….और हरामजादो, कल गाओं की पंचायत लगेगी, उसमें दिखाना तुम अपने ये गंदे-काले चेहरे.” मुंगेरी,जो सिर्फ़ शराब के लालच में आया था, गिड़गिदा रहा था,”जाने दो ठकुराइन, ये बहक गये थे.”. बाकी तीनो नशे और शर्म की मिली जुली हालत में कभी आँखें झपका रहे थे, कभी खेत के ज़मीन की तरफ देख रहे थे.एक तेज़ हवा का झोंका आया औरएक समय के लिए रूपाली की सारी का पल्लू सरक गया. ढलती शाम में तीनों कलूटों नेएक समय के लिए गुलाबी ब्लाउस में क्वेड दो उन्नत उरोज़ देखे और उनकी आँखें चौंधिया गयी.
सकपका कर रूपाली ने झट से आँचल ठीक किया और कदक्ते हुए बोली,”चल कमला.” मुड़कर चलने लगी, गाओं की ओर. चारों पुरुष वहीं हक्के-बक्के से खड़े रह गये थे.
300 मीटर चले होंगे रूपाली और कमला कि अब सन्न होने की बारी रूपाली की थी. शायद उन कलूटों ने छ्होटा रास्ता लिया था, या तेज़ तेज़ चलते हुए बराबर के रास्ते से आए थे. जो भी था, सच्चाई ये थी कि सत्तू, मोतिया, कालू और मुंगेरी भी, उन दोनो के सामने खड़े थे. “क्या है?” रूपाली चीखी. नीच जात के मोतिया नेएक थप्पड़ रूपाली के गाल पे रसीद दिया और बोला,”हरामजादि. हमको पंचायत के हवाले करेगी? कर साली. पर उनको पूरी बात बताना. कि कैसे हम ने तेरी चुदाई की रांड़.”एक समय के लिए रूपाली को अपने कानो पे विश्वास नहीं हुआ. ये नीच जात के लोग, जो ठाकुरों की छाया पे भी पांव रखने के कारण पिट जाया करते थे, उसकी इज़्ज़त लूटने की बात कर रहे थे…….ठाकुर साहब की बहू की इज़्ज़त.
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“खबरदार…”, रूपाली चिल्लाई….मगर उसके इतना बोलते ही मोतिया ने उसे तड़ातड़ 4-5 थप्पड़ लगा दिए. पीड़ा और अपमान से रूपाली के आँसू छल-छला आए. “जाने दो…”, उसकी कराह निकली. कमला, जिसकी गदराई हुई जवानी को पाने के लिए कलूटों ने ये सभी किया था बोली,”सत्तू चाचा, मोतिया भाय्या….ठकुराइन को जाने दो….आपको जो करना है, हमरे संग कर लेव भाय्या…” कालू और मोतिया वहशियो की तरह हँसने लगे. कालू ने कसकर कमला का हाथ पकड़ लिया और सत्तू और मोतिया ने रूपाली के दोनो हाथ पकड़े और वो पुनः खेत के उसी हिस्से की ओर बढ़ने लगे, जहाँ उन्होने खेत के बीच कुछ स्थान सॉफ की थी और कमला को चोद्ने की कोशिश ही कर रहे थे कि रूपाली आ पहुची थी…….
रूपाली और कमला की हालत ऐसी थी मानो बकरियों को कसाई घसीट रहे हों. बीच बीच में धमकाने के लिए मोतिया उसके हाथ को ज़ोर से मरोड़ देता था और हर बार उसके मुँह से आआआः, निकल जाती थी. मुंगेरी नेएक दो बार अवश्य कहा,”अरे जानो दे रे ठकुराइन को….क्यूँ आफ़त मोले ले रहे हो….”, मगर शायद उसकी बातों की कोई अहमियत थी ही नहीं.
थोड़ी ही देर में वो सभी वहीं पहुँच चुके थे जहाँ खेत के बीचों-बीच कुछ गन्ने उखाड़ कर कुच्छ सॉफ स्थान बनाई गयी थी. खेत के गन्ने इतने ऊँचे थे कि यदि कोई भूले भटके आस पास आ भी जाए, उसे कुछ दिखाई देने का प्रश्न ही नहीं उठता था.
रूपाली और कमला को बीच में बैठा कर, उन्होने शराब की बोतलें खोल ली. सत्तू नेएक बड़ा सा घूँट लगाया और कड़वा सा मुँह बनाते हुए, बोतल रूपाली के होंठो पे लगाई और बोला,”ले, पी ले…” ये सभी अचानक हुआ था,इसलिये कुछ ज़हर जैसे कड़वे घूँट रूपाली के अंदर चले ही गये. खाँसते हुए उसने थूकते हुए कहा,”देखो….कल हवेली आ जाना और हम तुम सबको 2000 रुपये देंगी. हम वादा करते हैं, बात यहीं ख़तम हो जाएगी, पंचायत नहीं होगी.”
मुंगेरी झट से बोला,”परेशान की कोई बात नहीं ठकुराइन,…….अरे सत्तू, जाने दो इन्हें.” सत्तू गुर्राया,”चुप साले. हीज़ड़ा की माफिक बात करे है हमेसा….अबइसे पार या उस पार………………….ठकुराइन, लाख टके की चूत के बदले दूई हज़ार रुपय्या? कच्ची हैं आप हिसाब की….”
अब ज्यादा ही हल्की प्रकाश बची थी सूरज की. रूपाली समझ चुकी थी अब कुछ नहीं हो सकता था. स्वयं को कोस रही थी कि क्यूँ घर से निकली. कमला, जो रूपाली के आने तक इतने हाथ पांव मार रही थी, भी अब ढीली पड़ चुकी थी. उसको लग रहा था यदि वो भाग भी जाए तो ये ग़लत होगा, क्योंकि ठकुराइन, जिन्होने अपनी ज़िंदगी उसकी खातिर दावं पे लगा दी थी, दोबारा भी लूट जाएँगी.
कालू और मोतिया नशे की हालत कें उन ख़ूँख़ार कुत्तों की तरह लग रहे थे जो किसी घायल चिड़िया को मारने से पहले उसको कुछ देर के लिए दाँत दिखाते हैं और गुर्राते हैं. कालू अपनी लूँगी हटा चुका था. रूपाली ने नफ़रत से उसकी तरफ देखा. नीच जात के कालू ने नारंगी रंग का कच्छा पहन रखा था.बैठी हुई रूपाली को उसने छ्होटी पकड़ कर उठाया, स्वयं बैठ गया और उसको अपनी नंगी, काली जाँघ पे बिठा लिया. रूपाली सन्न रह गयी.
सत्तू सामने की तरफ से आया और उसने कालू की पीठ कोइसे तरह से जाकड़ लिया कि रूपाली उन दोनो के बीच में भींच गयी. रूपाली के पीठ, कालू के बदबूदार सीने से चिपकी हुई थी और सट्टी ने अपने काले, भद्दे होंठ, उसके खूबसूरत, रसीले होंठो पर चिपका दिए. सस्ती शराब की बदबू और काले पसीनेदार बदनों से निकलती हुई सदान्ध ने रूपाली का माथा चकरा दिया था….उसे लगा उसको उल्टी आ जाएगी. सत्तू रूपाली के होंठ चूस रहा था. कालू ने अपने हाथ सरकाए और रूपाली के मम्मे सहलाने लगा. रूपाली की पीठ से उसे पॉंड्स की भीनी भीनी महक आ रही थी और उसने ज़िंदगी में कभी भी इतनी खूबसूरत और खुशबूदार स्त्री का दीदार किया ही नहीं था. उसकी हालत उस पागल मक्खी जैसी थी जो जानती है कि शहद से चिपटने का अंज़ाम मौत है मगर दोबारा भी वो कुछ और नहीं सोच पाती.
कालू पागलों की तरह रूपाली के बॅबल ट्रक को भोंपु की तरह बजाने लगा और रूपाली की हर सिसकी, सत्तू के बदबूदार होंठों तक पहुँच कर रुक जाती थी. सत्तू ने रूपाली की खूबसूरत जीभ को अपने तंबाखू से सड़े हुए दाँतों के बीच पकड़ लिया और उसको चूसने लगा. इतना भरोसा था अब उन सबको कि आराम से दोबारा शारब पीने लगे और दोबारा से रूपाली को थोड़ी सी शराब पीला दी. सत्तू केबदबूदार चुंबन के पश्चात रूपाली का गला ऐसे सूख रहा था किइसे बार उसको ये कड़वी शराब भी इतनी बुरी नहीं लगी.
रूपाली की गोरी चूत और सुनेहरी गांद ने कभी किसी काले लंड को अपने पास तक नहीं फटकने दिया था. और आज ये बदबूदार, नीच जात के गंदे पुरुष उसके संग मनमानी कर रहे थे. मज़बूरी में रूपाली के आँसू छलक आए.
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“जाने दो हमें….हमें हवेली पहुँचना है….” रुंधी हुई आवाज़ मेंएक नाकाम कोशिश की उसने. मोतिया बोला,”हाँ हां, तेरे ख़सम, ससुर और देवर के भूत तेरा इंतेज़ार कर रहे हैं वहाँ ना? चुप कर रंडी.”
तीन बोतल शराब गटक चुके थे वो चारों लोग. मुंगेरी को उन्होने पैसे दिए और जल्दी से 4 बोतल शराब, मुर्गी-रोटी ले आने को कहा और वो झट से गाओं की ओर चल दिया. शराब में मुंगेरी के प्राण बस्ते थे मानो.
कालू ने हंसते हुए मोतिया से कहा,”मोतिया….ज़रा ठकुराइन को तोहार लौदा की मार तो दिखाई देब भाई……”, और मोतिया ने पहले कमला की अंगिया-चोली हटा दी और दोबारा उसका लहंगा भी. हल्की प्रकाश में कमला का सांवला, गदराया बदन मादार-जात नंगा था और वो सिसक रही थी. मज़बूत साँवले चूची जिनपर काली सी गोल चूचियाँ थी…….सपाट, सांवला पेट (स्टमक), साँवली मांसल, भारी-भारी जांघें और डरी हुई, हिरनी जैसी आँखें. मोतिया को ऐसी मस्त जवानी की कोई कदर नही थी ही नहीं…….रोमॅंटिक तरीके से चूमने, चूसने की जगह, साला कमला की चूत में उंगली घुसेड कर सिर्फ़ ये कोशिश कर रहा था कि वो जल्दी से कुछ गीली हो जाए, ताकि हू अपना लॉडा उसके अंदर डाल के चोद दे बस…….
मोतिया ने कमला के होंठों को अपने होंठों के बीच में लिया, दोनो हाथों से उसकी जांघों को अलग किया और अपनेएक हाथ में ढेर सारा थूक लेकर उसकी कोरी चूत और अपने काले मूसल लंड पे रगड़ने लगा. उसके पश्चात उसने अपना काला मोटा लॉडा कमला की चूत के मुँह पे रखा और धीरे-धीरे से कुछ अंदर किया……कमला की फटी हुई आँखें और सिसकियाँ बता रही थी कितना दर्द हो रहा है उसको……….मोतिया ने कमला के बंद दरवाज़े पे दबाव बढ़ाया….और अचानक,”ले मादरच्चोड़…….” कह कर कमला का बंद दरवाज़ा फाड़कर वो उसके अंदर घुस गया.
“उई मैययययययययययययययययाआआआआआआआआआअ रीईईईईई…………….मर गाइिईईईईईईई………आआआआआआआआआआआआआआन्न्नननननननननननननननगगगगगगघह,….
माआआआआ…………….मैयययययययययाआआआआआआआआआअ रीईईईईईई…………….” कमला का भयानक आरतनाद जारी था और मोतिया अब उसके आखरी परखच्चे ढीले करने में मशगूल था. ठप्प, ठप्प, ठप्प ठप्प……मोतिया की काली जांघें कमला की साँवली जांघों से टकरा रही थी………फुकच्छ-फुकच्छ. फुकच्छ-फुकच्छ फुकच्छ-फुकच्छ फुकच्छ-फुकच्छ….काला मोटा लॉडा, साँवली, सख़्त चूत के अंदर से संगीतमय आवाज़ें निकाल रहा था…….पहली बार मोतिया ने कमला के दाहिने मम्मे को चूसना शुरुआत किया और उसकी काली चूचियों को चूसने-काटने लगा. कमला की कोरी चूत से खून रिस रहा था पर मोतिया को कोई फ़िक्र नहीं थी. अब वो उसको अपने लंड की जड़ तक चोद रहा था और कभी कमला के मम्मे चूस्ता, कभी उसकी गर्देन और होंठ पे काट खाता.
कालू की नंगी जाँघ पे रूपाली बैठी थी और उसको सॉफ महसूस हो रहा था कालू का काला, अकड़ता हुआ लंड. कालू से रहा नहीं जा रहा था, उसने ब्लाउस के हुक खोले, ब्लाउस हटाया और ब्रा-ब्लाउस हटा के रूपाली के बंद कबूतरों को आज़ाद कर दिया. अब रूपाली उपरि से नंगी थी. गोरी पीठ को चूम चूम के कालो दीवाना हुआ जा रहा था. सत्तू ने अपनी बोतल अलग रखी और रूपाली के मम्मे बारी बारी से चूसने लगा. नफ़रत और अपमान से रूपाली सिसक रही थी.
कालू ने रूपाली की गर्देन को चूमना चूसना शुरुआत कर दिया था और सत्तू के तंबाखू से सड़े हुए दाँत उसकी गुलाबी चूचियों को काट रहे थे. रूपाली ने आँखें बंद कर ली थी और अजीब से सिहरन महसूस कर रही थी. दोनो चमारों का गोरी ठकुराइन को आध-नंगा देख कर वैसे ही बुरा हाल था…
क्रमशः.
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