अनीता नई-नवेली दुल्हन के रूप में सजी-सजाई सुहागरात मनाने की तैयारी में अपने पलंग पर बैठी थी, थोड़ा सा घूँघट निकाल रखा था जिसे दो उंगलियों से उठाकर बार-बार कमरे के दरवाजे की ओर देख लेती।
उसे बड़ी बेसब्री से इन्तजार था अपने पति के आने का, सोच में डूबी थी कि वह आकर धीरे-धीरे से उसका घूँघट उठाएगा और कहेगा- वाह ! कितनी ख़ूबसूरत हो तुम ! और दोबारा उसे आलिंगन-बद्ध करके उसके होंठ चूमेगा, दोबारा गाल, दोबारा गला और दोबारा धीरे-धीरे थोड़ा सा नीचे … और नीचे… दोबारा और नीचे… फिसलता हुआ नाभि तक उतरेगा… और दोबारा उसके पश्चात क्या होगा इसकी विचार में डूबी रहते उसे बहुत देर हो चली।
रात के ग्यारह बज गए, उसकी निगाहें दरवाजे पर ही टिकीं थीं, करीब आधे घंटे के पश्चात किसी ने दरवाजे की कुण्डी खटखटाई और उसके पतिदेव ने अपनी मुँह-बोली भाभी के संग कक्ष में प्रवेश किया।
पति अनमोल आकर दुल्हन के पलंग पर बैठ गया।
भाभी बोली- देख बहू, कहने को तो मैं तेरे पति की मुँह-बोली भाभी हूँ पर समझती हूँ बिल्कुल अपने सगे देवर जैसा ही।
वह धीरे-धीरे से उसके कान में फुसफुसाई- देवर जी, जरा शर्मीले मिजाज़ के हैं। आज की रात पहल तुझे ही करनी पड़ेगी। पश्चात में सभी ठीक हो जायेगा।
उसके जाने के पश्चात अनीता ने उठकर कुण्डी लगा ली। अनमोल चुपचाप यों ही बुत बना बैठा रहा। अनीता उसके पास खिसकी कि वह मुँह फेर कर सो गया।
अनीता बहुत देर तक सोचती रही कि अब उठेगा और उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके चुम्बन लेगा… दोबारा उससे कहेगा- चलो, सोते हैं। सारे दिन की थकी-हारी होगी। और दोबारा अपने संग लेटने को कहेगा। वह थोड़े-बहुत नखरे दिखा कर उसके संग सुहागरात मनाने को राज़ी हो जाएगी।
अनीता को सोचते-सोचते न जाने कब नींद आ गई। जब घड़ी ने दो बजाये तो उसकी दोबारा आँख खुल गईं। उसने उसी तरह लेटे-लेटे धीरे-धीरे से अपनीएक टांग पति के उपरि रख दी। पति हल्का सा कुनमुनाकर दोबारा से सो गया।
रात बीतती जा रही थी, अनीता प्रथम रात्रि के खूबसूरत मिलन की आस लिए छटपटा रही थी।
अनीता के सब्र का बाँध टूटने लगा, मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठने लगीं- कहीं उसका पति नपुंसक तो नहीं, वर्ना अब तक तो उसकी स्थान कोई भी होता तो उसके बदन के चिथड़े उड़ा देता।
उसके मन में आया कि क्यों न पति के पुरुषत्व की जाँच कर ली जाये। उसने धीरे-धीरे से सोता-नीदी का अभिनय करते हुए अपनाएक हाथ अनमोल की जाँघों के बीचोंबीच रख दिया। उसे कोई कड़ी सी चीज उभरती सी प्रतीत हुई।
अनीता ने अंदाज़ कर लिया कि कम से कम वह नपुंसक तो नहीं है। आखिर दोबारा क्यों वह अब तक चुपचाप पड़ा है।
उसे भाभी की बात याद आ गई ‘बहू, हमारे देवर जी जरा शर्मीले मिजाज़ के हैं। आज की रात पहल तुझे ही करनी पड़ेगी।’
चलो, मैं ही कुछ करती हूँ, वह पति से बोली- क्यों जी, ऐसा नहीं हो सकता कि मैं तुमसे चिपट कर सो जाऊँ, नया घर है, नई जगह, मुझे तो डर सा लग रहा है।
“ठीक है, सो जाओ। मगर मेरे उपरि अपनी टांगें मत रखना !”
“क्यों जी, आपकी पत्नी हूँ, कोई गैर तो नहीं हूँ।”
अनमोल कुछ न बोला, पत्नी उससे चिपट गई, दोनों की साँसें टकराने लगीं, अनीता पर मस्ती सी छाने लगी, उसने धीरे-धीरे से अपनीएक टांग उठाकर चित्त लेटे हुए पति पर रख दी।
इस बीच उसने दोबारा कोई सख्त सी चीज अपनी जांघ पर चुभती महसूस की। वह बोली- ऐसा करते हैं, मैं करवट लेकर सो जाती हूँ। तुम मेरे उपरि अपनी टांग रखो, मुझे बढ़िया लगेगा।
ऐसा कहकर अनीता ने पति की ओर अपनी पीठ कर दी, अनमोल कुछ बोला नहीं पर उसने पत्नी के कूल्हे पर अपनीएक टांग रख दी। अनीता को इसमें बड़ा ही बढ़िया लग रहा था क्योंकि अब वह पति की जाँघों के बीच वाली चीज अपने गाँड़ों के बीचो-बीच गड़ती हुई सी महसूस कर रही थी। इसी को पाने के लिए ही तो बेचारी घंटों से परेशान थी।
आज उसका पति जरूर उसके मन की बात समझ कर रहेगा। यदि नहीं भी समझा तो समझा कर रहूंगी।
अनीता से अब अपने यौवन का बोझ कतई नहीं झिल पा रहा था, वह चाह रही थी कि उसका पति उसके तन-बदन को किसी रसदार नींबू की तरह निचोड़ डाले, स्वयं भी अपनी प्यास बुझा ले और अपनी तड़पती हुई पत्नी के जिस्म की आग भी ठंडी कर दे।
अत: उसने पति का हाथ पकड़ कर अपने सीने की गोलाइयों से छुआते हुए कहा- देखो जी, मेरा दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है। अनमोल ने पत्नी की छातियों के भीतर तेजी से धड़कते हुए दिल को महसूस किया और बोला- ठहरो, मैं अभी पापा को उठाता हूँ। उनके पास ज्यादा सारी दवाइयाँ रहती हैं, तुम्हें कोई-न कोई ऐसी गोली दे देंगे कि तुम्हारी ये धड़कन कम हो जाएगी।
अनीता घबरा उठी, बोली- अरे नहीं, जब पति-पत्नी पहली रात को साथ-साथ सोते हैं तो ऐसा ही होता है।
“तो दोबारा मेरा दिल क्यों नहीं धड़क रहा? देखो, मेरे दिल पर हाथ रख कर देखो।”
अनीता बोली- तुम लड़की थोड़े ही हो, तुम तो लड़के हो। तुम्हारी भी कोई चीज फड़क रही है, मुझे पता है।
अनीता मुस्कुराते हुए बोली।
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अनमोल बोला- पता है तो बताओ, मुझे क्या हो रहा है?
अनीता ने दोबारा पूछा- बताऊँ, बुरा तो नहीं मानोगे?
“नहीं मानूंगा, चलो बताओ?”
अनीता ने पति की जाँघों के बीच के बेलनाकार अंग को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर कहा- दोबारा ये क्या चीज है जो बराबर मेरी पीठ में गड़ रही है? कहीं किसी का बिना बात में तनता है क्या?
अनमोल सच-मुच झेंप सा गया और बोला- मेरा तो कुछ भी नहीं है, पड़ोस-वाले भैया का तो इतना लम्बा और मोटा है कि देख लोगी तो डर जाओगी।
अनीता ने पूछा- तुम्हें कैसे पता कि उनका ज्यादा मोटा और लम्बा है? तुमने क्या देखा है उनका?
अनमोल थोड़ा रुका, दोबारा बोला- हाँ, मैंने देखा है उनका।एक बार मैं अपनी खिड़की सेबाहर् की ओर झांक रहा था कि अचानक मेरी निगाह उनके कमरे की ओर उठ गई। मैंने देखा कि भइया भाभी को बिल्कुल नंगी करके…!!!
“क्या कर रहे थे भाभी को बिल्कुल नंगी करके?” अनीता को इन बातों में बड़ा आनन्द आ रहा था, बोली- बताओ न, तुम्हें मेरी कसम है।
अनमोल ने अनीता के मुँह पर हाथ रख दिया और नाराज होता हुआ बोला- आज के पश्चात मुझे कभी अपनी कसम मत देना !
“क्यों?” अनीता ने पूछा।
अनमोल बोला-एक बार मुझे मेरी मम्मी ने अपनी कसम दी थी, वो मुझसे हमेशा के लिए दूर चली गईं।
“इसका मतलब है तुम नहीं चाहते कि मैं तुमसे दूर चली जाऊँ?”
अनमोल खामोश रहा।
अनीता ने कहा- यदि तुम मेरी बात मानोगे तो मैं तुम्हें कभी अपनी कसम नहीं दूँगी, कहो मानोगे मेरी बात?
अनमोल ने धीमे स्वर में हामी भर दी।
अनीता बोली- दोबारा बताओ न, क्या किया भैया ने भाभी के साथउन्को नंगी करके?
अनमोल बोला- पहले भैया ने भाभी को बिल्कुल नंगी कर डाला और दोबारा स्वयं भी नंगे हो गए। दोबारा उन्होंनेएक तेल की शीशी उठाकर भाभी की जाँघों के बीच में तेल लगाया, तब उन्होंने अपने उस पर भी मसला।”किस पर मसला?” अनीता बातों को कुरेद कर पूरा-पूरा मज़ा ले रही थी संग ही पति के मोटे बेलनाकार अंग पर भी हाथ फेरती जा रही थी।
“बताओ, किस पर मसला?”
“अरे, अपने बेलन पर मसला और किस पर मसलते!”
“फिर आगे क्या हुआ?”
“होता क्या. उन्होंने अपना बेलन भाभी की जाँघों के बीच में घुसेड़ दिया… और दोबारा वो बहुत देर तक अपने बेलन को आगे-पीछे करते रहे… भाभी मुँह से बड़ी डरावनी आवाजें निकाल रहीं थीं। ऐसा लग रहा था कि भाभी को बहुत दर्द हो रहा था मगर… दोबारा वह भैया को हटाने की बजाय उनसे चिपट क्यों रहीं थीं, ये बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई।”
अनीता बोली- मेरे भोले पतिदेव, ये बात तुम तब समझोगे जब तुम किसी के अन्दर अपना ये बेलन डालोगे।
अनमोल ने पूछा- किसके अन्दर डालूँ?
अनीता बोली- मैं तुम्हारी पत्नी हूँ मेरी जाँघों के बीच में डाल कर देखो, मुझे आनंद आता है या मुझको दर्द होता है?
“ना बाबा ना, मुझे नहीं डालना तुम्हारी जाँघों के बीच में अपना बेलन। तुम्हें दर्द होगा तो तुम रोओगी।”
अनीता बोली- यदि मैं वादा करूँ कि नहीं रोऊँगी तो करोगे अपना बेलन मेरे अन्दर?
“मुझे शर्म आती है।”
अनीता ने पति की जाँघों के बीच फनफनाते हुए उसके बेलन को पकड़ लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी।
अनमोल का बेलन और भी सख्त होने लगा।
अनीता बोली- अच्छा, मेरीएक बात मानो। आज की रात हम पति-पत्नी की सुहाग की रात है। यदि आज की रात पति अपनी पत्नी की बात नहीं मानेगा तो पत्नी मर भी सकती है। बोलो, क्या चाहते हो मेरी जिन्दगी या मेरी मौत?
“मैं तुम्हारी जिन्दगी चाहता हूँ।”
“तो दे दो दोबारा मुझे जिन्दगी।” अनीता बोली- आ जाओ मेरे उपरि और मसल कर रख दो मुझ अनछुई कच्ची कली को।
अनमोल डर गया और शरमाते हुए पत्नी के उपरि आने लगा।
अनीता बोली- रुको, ऐसे नहीं, पहले अपने सारे कपड़े उतारो।
अनमोल ने वैसा ही किया। जब वह नंगा होकर पत्नी के उपरि आया तो उसने पाया कि उसकी पत्नी अनीता पहले से ही अपने सारे कपड़े उतारे नंगी पड़ी थी।
अनीता ने अनमोल से कहा- अब शुरुआत करो ना !
अनीता ने अपनी छातियों को खूब सहलवाया और उसका हाथ अपनी जाँघों के बीच में ले जा कर अपनी सुलगती सुरंग को भी सहलवाया।
अनमोल बेचारा…एक छोटे आज्ञाकारी बच्चे की भांति पत्नी के कहे अनुसार वो सब-कुछ किये जा रहा था जैसा वह आदेश दे रही थी। अब बारी आई कुछ ख़ास काम करने की।
अनीता ने पति का लिंग पकड़ कर सहलाना शुरुआत कर दिया और उस पर तेल लगा कर मालिश करने लगी।
अगले ही क्षण उसने पति के तेल में डूबे हथियार को अपनी सुलगती हुई भट्टी में रख लिया और पति से जोर से धक्के मारने को कहा। तेल का चुपड़ा लिंग घचाक से आधे से ज्यादा अन्दर घुस गया।
“उई माँ… मर गई मैं तो…” अनीता तड़प उठी और सुबकते हुए पति से बोली- आखिर फाड़ ही डाली ना तुम्हारेइसे लोहे के डंडे ने मेरी सुरंग।
अगले ही समय बाकी का आधा लिंग भी योनि मैं जा समाया। उसकी योनि बुरी तरह से आहत हो चुकी थी, योनि-द्वार से खून काएक फव्वारा सा फूट पड़ा…
परइसे दर्द से कहीं ज्यादा उसे आनन्द की अनुभूति हो रही थी… वह पति को तेज और तेज रफ़्तार बढ़ाने का निर्देश देने से बाज़ नहीं आ रही थी।आह ! आज तो मज़ा आ गया सुहागरात का।
पति ने पूछा- यदि दर्द हो रहा है तो निकाल लूँ अपना डंडा बाहर?
“नहीं,बाहर् मत निकालो अभी… बस घुसेड़ते रहो अपना डंडा मेरी गुफा में अन्दर-बाहर…जोर जोर से. आह… और जोर से… आज दे दो अपनी मर्दानगी का सबूत मुझे… आह अनमोल… यदि तुम पूरे दिल से मुझे प्रेम करते हो तो आज मेरीइसे सुलगती भट्टी को फोड़ डालो…
अनमोल को भी अब बहुत आनन्द आ रहा था, वह बढ़-चढ़ कर पूरा मर्द होने का परिचय दे रहा था।
लगभग आधे घंटे की लिंग-योनि कीइसे लड़ाई में पति-पत्नी दोनों ही मस्ती में भर उठे।
कुछ देर के लगातार घर्षण ने अनीता को पूरी तरह तृप्त कर दिया, बाकी की रात दोनों एक-दूजे से यों ही नंगे लिपटे सोते रहे।
सुबह आठ बजे तक दोनों सोते रहे।
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अनीता की शादी अनमोल से हुई और सुहागरात को अनमोल की मुँहबोली भाभी उन दोनों कोएक संग कमरे में करके अनीता को बता गई कि अनमोल शर्मीला तो संभोग की पहल अनीता को ही करनी होगी… हुआ भी यही… अनीता ने अनमोल को संभोग के लिए तैयार किया और उसके पश्चात करीब आधे घंटे की लिंग-योनि कीइसे लड़ाई में पति-पत्नी दोनों ही मस्ती में भर उठे।
कुछ देर के लगातार घर्षण ने अनीता को पूरी तरह तृप्त कर दिया, बाकी की रात दोनों एक-दूजे से यों ही नंगे लिपटे सोते रहे।
सुबह आठ बजे तक दोनों सोते रहे।
जब अनीता के ससुर रामलाल ने आकर दरवाजा खटकाया तब दोनों ने जल्दी से अपने-अपने कपड़े पहने और अनीता ने आकर कुण्डी खोली।
सामने ससुर रामलाल को खड़े देख उसने जल्दी से सिर पर पल्लू रखा और उसके पांव छुए।
‘सदा सुखी रहो बहू!’ कह कर ससुर रामलालबाहर् चला गया।
अनीता ने अपने ससुराल में आकर सिर्फ दो लोगों को ही पाया।एक तो उसका बुद्धू, अनाड़ी पति और दूसरा उसका ससुर रामलाल।
सास, ननद, जेठ, देवर के नाम पर उसने किसी को नहीं देखा।
वह अपने अनाड़ी पति के वारे में सोचती तो उसे अपने भाग्य पर ज्यादा ही क्रोध आता। लेकिन अब हो भी क्या सकता था। दोबारा वह सब्र कर लेती कि चलो बस औरतों के मामले में ही तो अनमोल शर्मीला है। बाकी न तो पागल है और न ही कम-दिमाग है। वैसे तो हर अच्छे-बुरे का ज्ञान है ही उसे।
वह सोचने लगी कि यदि कल रात वह स्वयं पहल न करती तो सारी रात यों ही तड़पना पड़ता उसे।
सुहागरात से ही अनीता के तन-बदन में आग सी लगी हुई थी, फिर भी उसके पति ने उसे संतुष्ट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। उसने जैसा कहा, बेचारा वैसा ही करता रहा था सारी रात, लेकिन दोबारा भी अनीता के जिस्म की प्यास पूरी तरह से नहीं बुझ पाई थी।
वह तो चाहती थी कि सुहाग की रात उसका पति उसके जवान व नंगे जिस्म की एक-एक पर्त हटा कर उसकी जवानी का भरपूर आनन्द लेता लेकिन अनमोल ने तो उसे नंगा देखने तक से मना कर दिया था।
सुबह जब अनमोल उठा तब से ही उसकी तबियत कुछ ख़राब सी हो रही थी। वह सुबह खेतों में चला तो गया परन्तु अनमने और अलसाए हुए मन से।
दूसरी रात दोबारा पत्नी ने छेड़ा-खानी शुरुआत कर दी, वह रात भर उसे अपनी ओर मोहित करने के नए-नए उपाय करती रही मगर अनमोल टस से मस न हुआ।
हार झक मार कर वह सो गई।
तीसरी रात को अनमोल ने कहा- अनीता मुझे परेशान न करो, मेरी तबियत ठीक नहीं है।
अनीता ने अनमोल के बदन को छूकर देखा उसे सचमुच बुखार था। अनीता ने माथे पर पानी की गीली पट्टी रख कर सुबह तक बुखार तो उतार दिया दोबारा भी वह स्वयं को ठीक महसूस नहीं कर रहा था। अनमोल को डाक्टर को दिखाया गया।
डाक्टर ने बताया कि कोई खास बात नहीं है। ज्यादा परिश्रम करने के कारण उसको कमजोरी आ गई है।
तीन दिन के पश्चात अनमोल का बुखार उतर गया, अनीता के मन में लड्डू फूटने लगे कि आज की रात तो बस अपनी सारी इच्छाएँ पूरी करके ही दम लेगी।
आज तो वह पति के आगे पूरी नंगी होकर पसर जायेगी दोबारा देखें कैसे वह मना करेगा।
रात हुई, अनीता पूरी तैयारी के संग उसके संग लेटी थी, धीरे-धीरे उसका हाथ पति की जाँघों तक जा पहुंचा। अनमोल नेएक बार को उसे रोकना भी चाहा लेकिन वह अपनी पर उतर आई। उसने पति के लिंग को कसकर अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया और कहने लगी यदि इतनी ही शर्म आती है तो दोबारा मुझसे शादी ही क्यों की थी, आज मैं तुम्हें वो सारी चीजें दिखाऊँगी जिनसे तुम दूर भागना चाहते हो।
ऐसा कहते हुए उसने अपने उपरि पड़ी रजाईएक ओर सरका दी और बोली- इधर देखो मेरी तरफ… बताओ तो सही मैं अब कैसी दिख रही हूँ।
अनमोल ने उसकी ओर देखा तो देखता ही रह गया- अनीता, तुम्हारा नंगा बदन इतना गोरा और सुन्दर है ! मैंने तो आज तक किसी का नंगा बदन नहीं देखा।
अपनी आशा के विपरीत पति के वचन सुनकर अनीता की बाछें खिल उठीं, उसने उछल कर पति को अपनी बांहों में भर लिया।
अनमोल बोला- अरे, जरा सब्र करो, मुझे भी कपड़े तो उतार लेने दो, आज मैं भी नंगा होकर ही तुम्हारा संग दूँगा।
वह अपने कुरते के बटन खोलता हुआ बोला।
तब तक अनीता ने उसके पायजामे का नाड़ा खोल दिया और उसे नीचे खिसकाने लगी।
‘अरे, अरे, रुको भी भई, जरा तो धीरज रखो। आज भी मैं वही करूँगा जो तुम कहोगी।’
‘तो दोबारा जल्दी उतार फेंको सारे कपड़ों को …और आ चढ़ोएक अच्छे पति की तरह मेरे उपरि !’
कपड़े उतार कर अनमोल अनीता के उपरि आ गया, उसका लिंग गर्म और तनतनाया हुआ था। अनीता ने लपक कर उसे पकड़ लिया और अपने समूचे नंगे जिस्म पर रगड़ने लगी।
अपने पति कोइसे हाल में देख वह ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। उससे ज्यादा देर तक नहीं रुका गया और उसने पति के लिंग को अपनी दोनों जाँघों के बीच कस कर भींच लिया और पति के उपरि आकर लिंग को अपने योनि-द्वार पर टिकाकर अपने अन्दर घुसाने का प्रयास करने लगी।
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