नौकरी के रंग मम्मी बेटी के संग
दोस्तो आपके लिएएक और मस्त कहानी पेश कर रहा हूँ आशा करता हू आपको बहुतपस्न्द आएगी ये कहानी मेरी पिछली कहानियों से ज़्यादा अच्छी ना हो पर बुरी भी नही होगी इसी उम्मीद के संग कहानी पेश है दोस्तो काफ़ी दिन से देख रहा हूँ अब आप लोगो को शायद कहानियों मे इंटरेस्ट नही आता इसीलिए तो आप लोगो ने कमेंट देना बिल्कुल ही बंद कर दिया है
भाई आप कमेंट पास करेंगे तभी तो पोस्ट करने वाले का हॉंसला बढ़ेगा और तभी आपकी ये साइट तरक्की करेगी
दोस्तो, मैं समीर. ऊपरवाले की मेहरबानी रही है कि उम्र और वक़्त के हिसाब से हमेशा वो हर चीज़ मिलती रही है जोएक सुखी ज़िन्दगी की जरूरत है।
इन जरूरतों में वो जरूरत भी शामिल है जिसे हम जिस्म की जरूरत कहते हैं यानि मर्दों को स्त्री के खूबसूरत जिस्म से पूरी होने वाली जरूरत!
मेरे लंड को वक़्त वक़्त पर हसीन और गर्मगर्म चूतों का तोहफा मिलता रहा है दोबारा वो चाहे कोई जवान अनाड़ी चूत हो या दोबारा खेली खाई तजुर्बेदार चूत!
दिल्ली है ही ऐसी स्थान जहाँ समझदार लंड को कभी भी चूत की कमी नहीं रहती।
वैसे आपको बता दूँ कि मैं रहने वाला बिहार का हूँ, बिहार की राजधानी पटना में ही मेरा जन्म हुआ लेकिन मैंने दिल्ली में अपने रिश्तेदारों के इधर रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की और दोबारा यहीं बढ़िया सी नौकरी भी मिल गई।
दिल्ली की चकाचौंध भरी ज़िन्दगी को अलविदा कहना इतना आसान नहीं होता लेकिन किस्मत का लिखा कौन टाल सकता है।
इसे मेरी ही बेवकूफी कह सकते हैं जो मैं अपने काम को कुछ ज्यादा ही अच्छे तरीके से करता रहा और मेरे कम्पनी के उपरि ओहदे पे बैठे लोगों ने ये सभी देख लिया।
दिल्ली में बस दो वर्ष ही हुए थे और इन दो सालों में मेरे काम से मेरे अधिकारी ज्यादा प्रभावित थे।
आमतौर पर ऐसी स्थिति में आपको बढ़िया सा प्रमोशन मिलता है और आपकी आमदनी भी बढ़ जाती है।
मेरे संग भी ऐसा ही हुआ लेकिनइसे प्रमोशन में भीएक ट्विस्ट था।
एक सुबह जब मैं अपने दफ्तर पहुँचा तो मेरे सरे सहकर्मियों नेएक एक करके मुझे बधाइयाँ देनी शुरुआत कर दी।
मैं अनजानों की तरह हर किसी के बधाई का शुक्रिया करता रहा और इसका कारण जानने के लिए अपनी प्यारी सी मित्र जो हमारी कम्पनी की एच। आर। ऑफिसर थी, उसके पास पहुँच गया।
उसने मुझे देखा तो मुस्कुराते हुए मेरी तरफएक लिफाफा बढ़ा दिया और मेरे बोलने से पहले मुझे बधाई देते हुए अपनएक आँख मार कर हंस पड़ी।
हम दोनों के बीच ये आम बात थी, हम हमेशाएक दूसरे सेइसे तरह की हसीं मजाक कर लिया करते थे।
जब मैंने वो लिफाफा खोला तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था क्यूंकि उस लिफाफे मेंएक ख़त था जिसमें लिखा था कि मुझे प्रमोशन मिली है और मेरी तन्ख्वाह डेढ़ गुना बढ़ा दी गई है।
लेकिन ये क्या… जब आगे पढ़ा तब पता चला कि ये प्रमोशन अपने साथएक ट्विस्ट भी लेकर आया है।
हमारी कम्पनी की कई शाखाएँ हैं और उनमें से कुछ शाखाएँ बढ़िया प्रदर्शन नहीं कर रही थीं। तो उन्हीं में सेएक शाखा बिहार के कटिहार जिले में है जहाँ हमारी कम्पनी को पिछले कई सालों से बहुत नुक्सान हो रहा था।
मेरी कम्पनी ने मुझे वहाँ शिफ्ट कर दिया था। मुझे समझ में नहीं आरहा था कि मैं हंसूँ या रोऊँ…
पहली नौकरी थी और बसएक वर्ष में ही प्रमोशन मिल रहा था तो मेरे लिए कोई फैसला लेना बड़ा ही मुश्किल हो रहा था।
मैंने अपने घर वालों से बात की और दोस्तों से भी सलाह ली।
सबने यही समझाया कि पहली नौकरी में कम से कम दो वर्ष तक टिके रहना ज्यादा जरूरी होता है ताकि भविष्य में इसके फायदे उठाये जा सकें।
सबकी सलाह सुनने के पश्चात मैंने मन मारकर कटिहार जाने का फैसला कर लिया और तीन महीने पहले इधर कटिहार आ गया।
कटिहारएक छोटा सा शहर है जहाँ बड़े ही सीधे साधे लोग रहते हैं। दिल्ली की तुलना में यहाँएक ज्यादा ही सुखद शान्ति का वातावरण है।
मेरी कम्पनी ने मेरे लिए दो कमरों काएक छोटा सा घर दे रखा है जहाँ मेरी जरूरत की सारी चीज़ें हैं… कमी है तो बसएक चूत की जो दिल्ली में चारों तरफ मिल जाया करती थीं।
खैर पिछले तीन महीनों से अपने लंड के संग खेलते हुए दिन बिता रहा था।
लेकिन शायद कामदेव को मुझ पर दया आ गई और वो हुआ जिसके लिये मैं तड़प रहा था।
हुआ यूँ किएक शाम जब मैं ऑफिस से अपने घर पुनः लौटा तो अपने घर के सामने वाले घर में बहुत चहल-पहल देखी।
पता चला कि वो उसी घर में रहने वाले लोग थे जो किसी रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे और शादी के पश्चात पुनः लौट आये थे।
मैं अपने घर में चला गया अपने बाकी के कामों में व्यस्त हो गया।
रात के करीब नौ बजे मेरे दरवाजे पे दस्तक हुई…
‘कौन?’ मैंने पूछा।
‘भाई साहब हम आपके पड़ोसी हैं…’एक खनकती हुई आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
मैंने झट से आगे बढ़ कर दरवाज़ा खोला तो बसएक समय के लिए मेरी आँखें ठहर सी गईं… मेरे सामने हरे रंग की चमकदार साड़ी में तीखे नयन नक्श लिए खुले हुए लहराते जुल्फों में करीब 25 से 30 वर्ष कीएक मदमस्त स्त्री हाथों में मिठाइयों से भरी थाल लिए मुस्कुरा रही थी।
मुझे अपनी तरफ यूँ घूरता देख कर उसने झेंपते हुए अपनी आँखें नीचे कर लीं और कहा- भाई साब… हम आपके पड़ोसी हैं…एक रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे, और आज ही लौटे हैं।
‘जी.जी. नमस्ते…’ मेरे मुख से बस इतना ही निकल सका।
‘ये कुछ मिठाइयाँ हैं. इन्हें रख लें और थोड़ी देर में आपको हमारे घर खाने पे पहुँचना है…’ ये कहते हुए उन्होंने थाली मेरी तरफ बढ़ा दी।
मैंने थाली पकड़ते हुए उनसे कहा- ये मिठाई तक तो ठीक है भाभी जी, लेकिन खाने की क्या जरूरत है… आप लोग तो आज ही आये हैं और थके होंगे दोबारा ये तकलीफ उठाने की क्या जरूरत है?
‘अरे ऐसा कैसे हो सकता है… आप हमारे शहर में मेहमान हैं और मेहमानों की खातिरदारी करना तो हमारा फ़र्ज़ है…’ अपनी खिलखिलाती हुई मुस्कराहट के संग उस स्त्री ने बड़े ही शालीन अंदाज़ में अपनी बात कही।
मैं तो बस उसकी मुस्कराहट पे फ़िदा ही हो गया।
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‘अन्दर आइये न भाभी…’ मैंने भी सभ्यता के लिहाज़ से उनसे घर के अन्दर आने का आग्रह किया।
‘अरे नहीं… अभी ढेर सारा काम पड़ा है… आप आधे घंटे में चले आइयेगा, दोबारा बातें होंगी।’ उन्होंने इतना कहते हुए मुझसे विदा ली और पुनः मुड़ कर अपने घर की तरफ चली गईं।
उनके मुड़ते ही मेरी आँखें अब सीधे वहाँ चली गईं जहाँ लड़कों की निगाहें अपने आप चली जाती हैं… जी हाँ, मेरी आँखें अचानक ही उनके मटकते हुए कूल्हों पर चली गईं और मेरे बदन मेंएक झुरझुरी सी फ़ैल गई।
उनके मस्त मटकते कूल्हे और उन कूल्हों के नीचे उनकी जानदार गोल गोल पिछवाड़े ने मुझे मंत्रमुग्ध सा कर दिया।
मैं दो समय दरवाज़े पे खड़ा उनके घर की तरफ देखता रहा और फिरएक कमीनी मुस्कान लिए अपने घर में घुस गया।
घड़ी की तरफ देखा तो घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे धीरे आगे की तरफ बढ़ रही थीं और मेरे दिल की धड़कनों को भी उसी तरह बढ़ा रही थीं।
एक अजीब सी हालत थी मेरी, उस हसीं भाभी से दुबारा मिलने का उत्साह और पहली बार उनके घर के लोगों से मिलने की हिचकिचाहट।
वैसे मैं बचपन से ही ज्यादा खुले विचारों का रहा हूँ और जल्दी ही किसी से भी घुल-मिल जाता हूँ।
खैर, दिल में कुछ उलझन और कुछ उत्साह लिए मैं तैयार होकर उनके दरवाज़े पहुँचा और धड़कते दिल के संग उनके दरवाज़े की घण्टी बजाई।
अन्दर से किसी के क़दमों की आहट सुने दी और उस आहट ने मेरी धड़कनें और भी बढ़ा दी।
दरवाज़ा खुला और मुझेएक और झटका लगा, सामनेएक खूबसूरत सा चेहराएक कातिल सी मुस्कान लिए खड़ा था।
सफ़ेद शलवार और कमीज़ में करीब 18 वर्ष कीएक बला की खूबसूरत लड़की ने मुस्कुराते हुए मुझे नमस्कार की और अन्दर आने का निमंत्रण दिया।
मैं बेवक़ूफ़ की तरह उसके चेहरे की तरफ देखता रहा और कुछ बोलना ही भूल गया…
‘अन्दर आ जाइये…’ अन्दर से वही आवाज़ सुनाई दी यानि कि उस स्त्री की जो अभी थोड़ी देर पहले मेरे घर पर मुझे खाने का निमंत्रण देने आईं थीं।
उनकी आवाज़ ने मेरा ध्यान तोड़ा और मैं भी बड़े शालीनता से उस हसीन लड़की की तरफ देखते हुए नमस्कार कहते हुए अन्दर घुस पड़ा।
घर के अन्दर आया तोएक भीनी खुशबू ने मुझे मदहोश कर दिया जो शायद उस कमरे में किये गए रूम फ्रेशनर की थी।
वोएक बड़ा सा हॉल था जिसमें सारी चीज़ें बड़े ही तरीके से सजाकर रखी गईं थीं।
सामने सोफे लगे हुए थे और उस परएक तरफएक सज्जन करीब करीब 50-55 वर्ष के बैठे हुए थे।
मैंने आगे बढ़ करउन्को नमस्कार किया औरएक सोफे पर बैठ गया।
तभी भाभी भी उस लड़की के संग आकर सामने के सोफे पर मुस्कुराते हुए बैठ गईं।
अब हमारी बातों का सिलसिला चल पड़ा और हमनेएक दूसरे से अपना अपना परिचय करवाया।
बातों बातों में पता चला कि वो बस तीन लोगों का परिवार है जिसमें उस परिवार के मुखिया अरविन्द झा जीएक सरकारी महकमे में सीनियर इंजिनियर हैं और पास के हीएक शहर पूर्णिया में पदस्थापित हैं। उनकी पत्नी रेणुका जीएक सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैंऔर उनकी इकलौती संतान यानि उनकी बेटी वन्दना बारहवीं में पढ़ रही थी।
थोड़ी देर में ही हम बहुत घुल-मिल गए और दोबारा खाने के लिए बैठ गए।
खाने के मेज पर मैं और अरविन्द जीएक तरफ और रेणुका तथा वन्दना सामने की तरफ बैठ गए।
अरविन्द जी भी बड़े ही खुले विचारों के लगे और मुझसे बिल्कुल ऐसे बात कर रहे थे जैसे कई सालों से हमारी जान पहचान हो।
मैं भी उनसे बातें करता रहा लेकिन निगाहें तो सामने बैठी दो दो कातिल हसीनाओं की तरफ खिंची चली जाती थी… उन दोनों के चेहरे से टपकते नूर ने धीरे-धीरे धीरे मेरे ऊपरएक नशा सा छ दिया था, मैं चाहकर भी उनके चेहरे से नज़रें हटा नहीं पा रहा था।
और दोबारा मेरी निगाहों ने अपनी असलियत दिखाई और चेहरे से थोड़ा नीचे की तरफ सरकना शुरुआत किया… रेणुका जी ने वही चमकदार हरे रंग की साड़ी अब भी पहन रखी थी और इतनी शालीनता से पहनी थी कि उनके गले के अलावा नीचे और कुछ भी नहीं दिख रहा था, लेकिन उनकी साड़ी ने इतना उभर बना रखा था किएक तजुर्बेदार इंसान इतना तो समझ सकता था कि उन उभारों के पीछे अच्छी खासी ऊँचाइयाँ छिपी हुई हैं।
उनकी रेशमी त्वचा से भरे हुए गले ने ये एहसास दिला दिया था कि उनका पूरा बदन यूँ ही रेशमी और बेदाग ही होगा।
दूसरी तरफ वन्दना अपने सफ़ेद शलवार कमीज़ में अलग ही क़यामत ढा रही थी।
उसने भी अपनी मम्मी की तरह अपने बाल खुले रखे थे जो पंखे की हवा में लहरा रहे थे और बार बार उसके चेहरे पे आ जाते थे, जिन्हें हटाते हुए वो और भी खूबसूरत लगने लगती थी।
गहरे गले की कमीज़ उसके गोल गोल चूचियों की लकीरों की हल्की सी झलक दे रही थीं जोएक जवान लड़के को विचलित करने के लिए बहुत होती हैं।
वैसे उसने दुपट्टा तो ले रखा था लेकिन अलग तरीके से यानि दुपट्टे को मफलर की तरह अपने गले में यूँ लपेट रखा था कि उसकाएक सिरा गले से लिपटते हुए पीछे की ओर था और दूसरा सिरा आगे की तरफ उसकी दाहिनी चूची के उपरि से सामने लटक रहा था।
यानि कुल मिला कर उसकी 32 साइज़ की चूचियाँ अपनी गोलाइयों और कड़ेपन का पूरा एहसास दिला रही थीं।
चूचियों की झलक और उसकी लकीरें दिल्ली में आम बात थीं… वहाँ तो न चाहते हुए भी आपको ये हर गली, हर नुक्कड़ पे दिखाई दे जाती थीं लेकिन इधर बात कुछ और थी।
दिल्ली की सुन्दरता थोड़ी बनावटी होती है और अभी मेरे सामने बिल्कुल प्राकृतिक और शुद्ध देसी सुन्दरता की झलक थी।
मेराएक दोस्त है जो बिहार के इसी प्रदेश का रहने वाला है और उसने कई बार बताया था किइसे इलाके की सुन्दरता हर स्थान से भिन्न है और मैं वो आज महसूस भी कर रहा था।
रेणुका जी और वन्दना दोनों मम्मी बेटियाँ बिल्कुल दो सहेलियों की तरहएक दूसरे से बर्ताव कर रही थीं और दोनों ही बिल्कुल चुलबुली सी थीं।
कुल मिला कर वो शाम ज्यादा ही शानदार रही और उन सबसे विदा लेकर मैं पुनः अपने कमरे पर आ गया।
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कमरे पर आकर मैं सोने की तैयारी करने लगा और अपनी आँखों में उन दो खूबसूरत चेहरे बसाये हुए सोने की कोशिश करने लगा।
यूँ तो मैंने कई खूबसूरत लड़कियों और औरतों के संग वक़्त बिताया है लेकिन पता नहीं क्यूँ आज इन दो मम्मी बेटियों के चेहरे मेरी आँखों से ओझल ही नहीं हो रहे थे।
खुली आँखों में उनकी चमक और आँखें बंद करते ही उनकी मुस्कराहट।
बस मत पूछिए की मेरा क्या हाल था, करवट बदलते बदलते रात कट गई।
सुबह आँख खुली तो बहुत देर हो गई थी।
मैं झटपट उठा औरबाहर् का दरवाज़ा खोला क्यूंकि दूध वाले का वक़्त था… लेकिन जब घड़ी पर नज़र गई तो मायूसी छा गई क्यूंकि बहुत देर हो चुकी थी और शायद दूध वाला बिना दूध दिए पुनः चला गया था।
मैं पुनः मुड़ा और अन्दर जाने लगा तभी किसी ने मुझे आवाज़ लगाई… ‘समीर जी…ओ समीर जी…’
मैंने मुड़कर देखा तो रेणुका भाभी हाथ हिलाकर मेरी तरफ ही इशारा कर रही थीं।
उनको देखते ही मेरे चेहरे पे छाई मायूसी गायब हो गई और मैंने मुस्कुरा करउन्को नमस्कार की।
रेणुका जी ने मुझे ठहरने का इशारा किया और पुनः अपने घर में चली गईं।
मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले वो अपने घर सेबाहर् निकलीं, उनके हाथों मेंएक बड़ा सा पतीला था।
मेरी नज़र पहले तो पतीले पे गई दोबारा बरबस ही पतीले से हटकर उनके पूरे बदन पे चली गई।
उन्होंने लाल रंग कीएक मस्त सी गाउननुमा ड्रेस पहन रखी थी जो उनकी सुन्दरता पे चार चाँद लगा रही थी।
वैसे ही खुले बालों में वो मुस्कुराती हुई अपनी कमर मटकती हुई धीरे-धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगीं।
‘आप क्या रोज़ इतनी देर तक सोते रहते हैं… आपका दूध वाला आया था और कई बार आपको जगाने की कोशिश करी, लेकिन जब आप नहीं जागे तो ये दूध हमारे इधर देकर चला गया…’ भाभी ने मुस्कुराते हुए शिकायत भरे लहजे में कहा।
‘अरे नहीं भाभी जी… दरअसल कल रात को बहुत देर हो गई थी सोते सोते,इसे लिए सुबह जल्दी उठ नहीं पाया।’ मैंने मासूमियत से जवाब दिया।
‘क्यूँ कल रात को कोई भूत देख लिया था क्या… जो डर कर सो नहीं पा रहे थे आप?’ भाभी ने खिलखिलाकर हंसते हुए मजाक किया।
मैंने भी मौके पे चौका मारा और कहा- भूत नहीं भाभी, बल्कि कुछ ज्यादा ही खूबसूरत भूतनी देख ली थीइसलिये उसको याद करते करते जगता रहा।
‘अच्छा जी… जरा संभल कर रहिएगा इधर की भूतनियों से…एक बार पकड़ लें तो दोबारा कितनी भी कोशिश कर लो, जाती ही नहीं…’ भाभी ने बड़े ही मादक अंदाज़ में मेरी आँखों में अपनी चंचल आँखों से इशारे करते हुए चुटकी ली।
‘अजी यदि इतनी खूबसूरत भूतनी हो तो कोई भला क्यूँ भागना चाहेगा, हम तो बस उससे चिपक कर ही रहेंगे।’ मैंने भी उनकी आँखों में झांकते हुए शरारत भरे अंदाज़ में कहा।
‘बड़े छुपे हुए रुस्तम हो आप… हमारी खूब ज़मेगी, लगता है।’ भाभी नेइसे बार मुझे आँख मार दी।
मैं समझ गया कि सच में हमारी खूब जमने वाली है क्यूंकि कल रात जब मैंने उनके पति अरविन्द जी को देखा था तभी समझ में आ गया था कि शायद कहीं न कहीं उनकी बढ़ती उम्र की वजह से भाभी की हसरतों का कोई कोना खाली रह जाता होगा और अभी उनकीइसे हरकत और इन बातों ने मुझे यकीन दिला दिया था कि जो कमी पिछले तीन महीनों से परेशान कर रही थी, वो अब पूरी होने वाली है।
‘फिलहाल कोई बर्तन ले आइये और ये दूध ले लीजिये…’ भाभी ने मेरा ध्यान दूध की तरफ खींचा।
मगर मैं ठहरा कमीना और मैंने भाभी के नेचुरल दूध की तरफदेख्ना शुरुआत कर दिया।
रात को साड़ी में छिपे इन बड़े बड़े दूध कलश को उनके गाउन के उपरि से अब मैं सही ढंग से देख पा रहा था।
बिल्कुल परफेक्ट साइज़ की चूचियाँ थीं वो।
मेरे अंदाज़े से 34 की रही होंगी जो कि मेरी फेवरेट साइज़ थी, न ज्यादा छोटी न ज्यादा बड़ी…
मुझे अपनी चूचियों की तरफ घूरता देख कर भाभी ने मेरी आँखों में देखा और अपनी भौहें उठा कर बिना कुछ कहे ऐसा इशारा किया मनो पूछ रहीं हो कि क्या हुआ।
मैंने मुस्कुराकरउन्को अपना सर हिलाकर ‘कुछ नहीं’ का इशारा किया और अपने घर में घुस गया और दूध का बर्तन ढूंढने लगा।
सच कहूँ तो उनसे बातें करके मेरे लंड महराज ने अपना सर उठा लिया था और उनकी चूचियों के एहसास ने उसे और हवा दे दी थी।
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